अपन
गारि अपन दुआरि
फगुआक
प्रात। ओना छल फगुआक पराते मुदा जहिना मासक अन्त तहिना सालोक अन्त तँ छेलैहे।
माने ई जे फागुन सालक अन्तिम मास छी आ चैत सालक पहिल मास। फगुओ एहेन पाबैन छी जे
मासक अन्तिम दिन पुरनिमा-केँ होइए। ओना, सालमे बहुतो पाबैन होइए मुदा फगुआ सन
धमगज्जर दोसरमे नहियेँ होइए।
आन
साल जहिना केते गोरेक कुरसी-ब्रेंच, आगिमे–माने सम्मत
जरैमे–स्वाहा होइ छल तहिना केते गोरेक टाटो-फरक होइते छल। तँए मनमे जिज्ञासा रहबे
करए जे ऐबेर की सभ भेल से तँ बुझबे अछि, तँए सबेरे-सकाल
चौकपर पहुँचलौं। ओना, चौकक रोहानी आन साल जकाँ नहियेँ छल, तेकर कारण भेल जे आन साल जेना लोक भँग-गाँजा,
ताड़ी-दारू पीब झुमबो करै छल, फगुओ-जोगिरा गबै छल आ लोकक
कुरसियो-ब्रेंच जरबै छल से ऐबेर नइ भेल।
चाह
पीब पान खा घरमुहॉं भेलौं। मनमे उठल जे ऐबेरक फगुआ रीब-रीबेमे चलि गेल, मुदा ‘नीक’ भेल कि ‘अधला’ से ताँइए ने कऽ पबै छेलौं। जँ नीक भेल तँ पुश्तैनी परम्परामे ठेंस
पहुँचै छल, जँ अधला भेल तखन तँ धीरे-धीरे पाबैनियेँ मेटा
जाएत। ओना फगुआ रंग-अबीरक पाबैनिक संग ढोलक-डम्फापर नाचो-गान तँ छीहे।
दरबज्जापर
अबिते सुनलौं जे आँगनमे पत्नीक संग जेठकी पुतोहु कहा-कही कए रहली अछि।
अढ़
दबि चौकीपर बैस अँगने दिस कान पाथि देलौं। ओना, फगुआक खुमारि मनसँ नइ हटल छल। खुमारि
ई जे फगुआ तँ रंग-अबीरक उत्साह छी। माने जीवनक रंगक उत्साहक पाबैन...।
दरबज्जापर
अबैसँ पहिने दुनू गोरे–पत्नी आ पुतोहु–मे की सभ कहा-कही भेलैन से तँ हल्लामे ने
नीक जकाँ सुनि पेलौं आ ने बुझिये पेलौं, मुदा जखन कान ठाढ़ केलौं तखन सुनलौं, पुतोहु सासुकेँ कहैत रहथिन-
“सासुसँ कोनो सुख नहि भेल।”
‘सासुसँ कोनो सुख नहि भेल’ सुनि पत्नी निरुत्तर छेली
तँए बकार बन्न रहैन। ओना, कोन एहेन प्रश्न अछि जेकर नीक कि
अधला उत्तर नइ अछि। मुदा किछु एहनो उत्तर तँ ऐछे जे रहितो तत्काल मनमे एबे ने करैए।
भरिसक सएह पत्नियोंकेँ भेलैन।
निरुत्तर
सासुकेँ देख पुतोहुकेँ आरो सह भेटलैन तँए रंग-बिरंगक प्रश्न उठा सासुकेँ
मुहेँ-काने तोपि रहल छेली...।
पुतोहुक
एकभग्गु अवाज सुनि मनमे भेल जे भरिसक पत्नी पछैर रहली अछि। परिवार छी, जखने एक दिन
पुतोहु सासुकेँ दाबि देती तँ दोसरो-तेसरो दिन की जे जिनगी भरि दाबिते रहती। जखने
सासु दबि जेती आ पुतोहु उठि जेती तखने परिवारमे अराजकताक स्थिति बनि जाएत!
दरबज्जापर
सँ उठि आँगन दिस विदा भेलौं। पुतोहु पुवारि भागमे रहैथ आ पत्नी पछवारि भागमे।
दरबज्जाक ओसारसँ जखने आगू बढ़लौं कि पत्नीक नजैर हमरापर पड़लैन। नजैर पड़िते
पत्नी दरबज्जा दिस अपन बात कहए आगू बढ़ली। पत्नीकेँ दरबज्जा दिस बढ़ैत देख अपने
ओसारक निच्चेँमे अँटैक गेलौं। अँटकैक कारण भेल जे भने बेरा-बेरी दुनू गोरे
अपन-अपन बात कहती जइसँ सभ बात नीक जकाँ बुझैमे आबि जाएत।
लग
अबिते पत्नी कहली-
“एना जे पुतोहु कहै छैथ जे ‘सासुसँ कोनो सुख नहि भेल’ से एहेन होइ?”
पत्नीक
बात सुनि मनमे भेल ‘एहेन होइ’ आकि ‘ओहन होइ’ ई तँ भेल विचारक दुनियाँक बात, मुदा जैठाम झगड़ा
होइए तैठाम जँ मुँह बन्न भऽ गेल तँ वएह ने हारब छी, से तँ
सासु हारिये रहल छेली। होइते छै किने जे बुधिक पेंच-पाँच बुधियारीक होइए मुदा कुश्तीक
पेंच-पाँच तँ तइसँ भिन्न होइए किने। कुश्तीकाल तँ जमीनपर खसाएबे ने हार-जीतक
फैसला करैए...।
पत्नीकेँ
कहलयैन-
“अहाँ सासु भेलौं आ ओ पुतोहु भेली।
जहिना ओ कहलैन जे सासुसँ कोनो सुख भेल, तहिना अहूँ ने उनटा कऽ
कहितिऐन जे पुतोहुओसँ कोनो सुख भेल।” अधखड़ुआ....
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