Tuesday, June 13, 2023

जगदीश प्रसाद मण्डल साहित्य
























 

टकुआटान

लोकक देखसी कहियौ आकि अप्पन कमजोरी, परदेशमे रहै छी। माने बंगलोरमे ट्रान्सपोर्टमे नोकरी करै छी। ओना, एते जरूर भेल अछि जे गामक जिनगी कहियौ आकि अप्पन जिनगी, जाधैर गाममे बितेलौं ताधैर नमरी[1] सालमे गोटे-गोटे दिन देखै छेलौं, बंगलोरमे रहने एते तँ भेबे कएल जे भरि-भरि दिन, माने आठ घन्टा ड्यूटीक समयमे, नमरीक कोन बात जे पनसैया, दससैया आ बीससैया[2] नोट गनैत-गनैत चुटकी खिया गेल अछि। माँड़े तँ माउग जीबैए, आ अपने जखन भरि दिन नोटे गनै छी तखन जँ कनियोँ छह-पाँच केलौं तँ पाँच-दस हजार अपनो जेबीमे आबिये जाइए। जखन लाख-दू-लाखक उलफी आमदनी महीनामे हएत तखन जँ जीवनक धार उलफी नइ बनए, माने जीवनमे उलफी खर्च नइ हुअए, तखन तँ ओहन उलफीकेँ बेइज्जतीए ने हएत। अपनो कि दुनियाँसँ हटल छी आकि अही दुनियाँमे छी, तखन जँ अप्पन जिनगी उलफी नइ बनत सेहो केहेन हएत। तँए, जहिना खेनाइ-पीनाइ तहिना ओढ़नाइ-पहिरनाइ आ तहिना बसो-बास माने रहैक घर सेहो बनेबे केलौं अछि।

बंगलोरमे रहितो मनमे सदिकाल गाम नचिते रहैए। केना बाबू पकैड़-पकैड़ स्कूलपर दऽ अबै छला। केना सोनिया माइक लतामक गाछपर चढ़ि चोराकऽ लताम तोड़ि लइ छेलौं। केना राति-के मशाल लेसि, ऐठाम मशालक माने अछि, गाम-घरमे लोक माटिक डाबाकेँ एक भाग हँसुआसँ काटि, गरदैनमे डोरी बान्हि, माने लटकबैबला, आ बीचमे माने डाबाक बीचमे माटिक डिबिया लेसि, अन्हारो रातिमे अपनो आ अनको आम चोरा कऽ बीछ लइ छेलौं..! आरो-आरो गामक क्रियाकलाप सभ दिन-राति भितरिया मनमे नचिते रहैए। मुदा मनक एहेन विशाल समुद्रकेँ ओहिना मनेमे दाबि, जहिना वंशराजक सात-साए बरदकेँ हंसराज मोटरी बान्हि रखि देलकैन, जेकरा कौआ लऽ कऽ उड़ि गेल, तहिना अप्पन मनक समुद्रकेँ अपनो एकटा पोलीथिनक झोराक मोटरी बान्हि तेना जुमाकऽ जिनगीसँ कात फेंक देने छी जे परिवारमे पित्ती-पितिआइन मुइली, जीबैतमे मुँह देखैक कोन बात जे दाहो-संस्कारमे गाम नइ आबि भेल। नइ एलौं, तेहेन बहाना पितियौत भाय-साहैबक सोझामे रखलौं जे ओहो मानि गेला आ कहलैन जे बौआ, मृत्यु तँ सभकेँ लगले अछि, मरबे करत, तँए जँ माए आ बाबूक मृत्युक समय गाम नहि एलह तँ कि हेतइ। काज कि तोरा-ले पड़ल रहल आकि भेबे कएल। भाइयो साहैब छुट्टी दइये देलैन।

गामक सुमारक बेसी तखन भेल जखन अप्पन उमेर पचास बरख टपल आ चारू बेटाक बीच पाइ-कौड़ीक कटौज उठल। दुनियाँ तँ दुनियाँ छी बाप तवाह बेटा ले, माने ऐगला पीढ़ी ले जे सातो पीढ़ीक ओरियान माने सम्पैत ढेरियाकऽ जँ नइ रखलौं, तखन जीवने की भेल। तहिना बेटा तवाह जे अपने कमाइक (काज करैक) खगते कोन अछि, बापक देल सम्पैत हाथ लगबे करत। जेते जीवन भरि कमा कऽ खर्च करब, माने जीवन चलाएब, तेते तँ बापेक देल रहत..! यएह तँ छी सामाजिक जीवन। समाजमे सदिकाल धर्म-पाप, स्वर्ग-नर्क आ देवी-देवताक चर्च होइते रहैए, से खाली किसानपुरे टा गाममे होइए से बात नहि। आनो-आन गाम- भागपुर, विलासपुर, जोगपुर सन-सन अनेको गाममे सेहो होइए। ओना, किसानपुर गामक लोकक विश्वास छैन जे जहिना स्वर्ग एक दिन जन्म लइए तहिना घटैत-बढ़ैत एक दिन अन्त सेहो होइते अछि से ओहिना जहिना बैंकमे रूपैआ जमा करै छी आ ओइमे सँ उठा-उठा खर्च करैत जाइ छी आ एक दिन ओहन अबैए जइ दिन रूपैआ सठि जाइए। तेकर पछाइत जँ बैंकपर बलउमकी जेबे करब तँ बैंकक सिपाही धक्का मारि निकालि देत कि नहि निकालि देत। तहिना स्वर्ग अछि। कोनो नीक कर्म केला-पछाइत स्वर्गक अधिकारी बनै छी आ अधला कर्म करैत आगू बढ़ै छी, तखन पापक मोटरी नमहर भेने स्वर्गक रास्ता बन्न भऽ जाइते अछि आ नर्कक रास्ताक मुँह चौड़गर भइये जाइए। खाएर जे होइए, ओ स्वर्ग-नर्क गेनिहार जानैथ, अपना ओइसँ कोन मतलब अछि। मतलब एतबे अछि जे जहिना सभ बुझै छैथ जे दुनियाँमे अनेको लोक अछि, सतलोक, बैकुण्ठलोक, स्वर्गलोक, नर्कलोक, साकेतलोक इत्यादि, जइमे जिनकर जेहेन किरदानी से तेहेन बास करै छैथ।

 

अपने अखन पचासे बर्खक छी, पत्नी दू बरख छोटे छैथ माने अड़तालीस बर्खक, चारू बेटा सोलह बर्खसँ छब्बीस बर्खक बीच अछि, जेकरा पढ़ा-लिखा अपनासँ ऊपर बनबए चाहै छेलौं, बंगलोरमे अनभुआरपन रहने कहियौ आकि जीवन जीबैक, एकोटा नीक शिक्षा नहि पेब सकल। कहब जे स्कूल-कौलेज बंगलोरमे नहि अछि जे अहाँक बेटा शिक्षा नहि पेब सकल? ऐठाम कौलेजिया डिग्रीक चर्च नहि कऽ रहल छी, ऊपरका तीनू भाँइ एम.ए. पास करबे केने अछि, आ चारिम ऑनर्स केला-पछाइत एम.ए.मे पढ़ैए। नीक शिक्षाक माने नीक मनुक्ख बनब छी। नीक मनुक्ख बनैक ज्ञान, ऐठाम ज्ञानक माने अछि ओहन ज्ञान जे विवेकक चक्षुकेँ प्रकाशित कऽ दिअए, से केकरो ने भेल। जखने से होइए तखने ने ओ विचारए लगैए जे मनुक्ख भगवानकेँ खोजनिहार ओहन खोजी छैथ जे भगवानक परिचय करा सृजन केलैन। नहि कि भगवान मनुक्खक खोजी छैथ। जिनका अपने हाथ-पएर नहि छैन ओ केना टहैल-टहैल सात अरब मनुक्खक परिचय देता।

 

चारू बेटा, बंगलोरक परिवेशक अनुकूल, जिनगी ओहन बना नेने अछि, जेकरा पुरबैमे हजारक कोन चर्च जे लाखमे चलि रहल अछि। देखिते छी जे डॉक्टरीक शिक्षा पचास लाखक सीमा टपि रहल अछि, तहिना आन-आन शिक्षाक गति-विधि अछि। भाइक विचार माने सहोदर भाइक प्रेम-सिनेह केना बनैए, ऐठाम कबीरदासक चर्च नइ कऽ रहल छी। ओ वाल्मीकि जकाँ स्रष्टेटा नहि द्रष्टा सेहो छला, तँए हुनकर अप्पन रामो छैन आ अध्यात्म सेहो छैन। तैसंग रामक समाजो छेलैन। भाइक सम्बन्ध माने सहोदर भाइक बीच एहेन विचार जगिये गेल अछि, जे परिवेशक अनुकूल, भाय-भाइक कर्ता-धर्ता दुनू छैथ, से नहि विचारि भाइक माने भऽ गेल अछि पिताक सम्पत्तिक बराबरीक हिससेदार। यएह तँ सोच नव पीढ़ीमे जगि रहल अछि। ऐठाम ई नइ बुझब जे शत-प्रतिशत युवा-पीढ़ीमे एहने विचार जगि गेल अछि। जहिना संख्या रहितो एक आ सइयक बीच निनानबे सीढ़ीक दूरी अछि, तहिना समाजक बीच मनुक्खक सेहो अछि। एकाएक मनमे उचाट आएल। बिना सोचने-विचारने बैगमे कपड़ा-वस्तर सैंतए लगलौं, जे आइये गाम चलि जाएब। मन जेना उड़ि गेल रहए तहिना चेहराक रंग-रूप सेहो बनि गेल। तहीकाल माने बैग जे सेरियबैत रही तखने, पत्नी आबि बाजैथ किछु ने मुदा बैगकेँ अपना नजैरसँ देखि रहल छेली। देखि रहल छेली जे जखन कखनो केतौ जाइ छैथ, माने पति केतौ जाइ छैथ, तँ कहि दइ छला, मुदा आइ किछु ने कहलैन।

 

अपना जेना परिवारक संग विरक्ति भऽ गेल तहिना मनमे उठि गेल जे पत्नी दिस आँखि उठा एक्कोबेर नै देखी। देखी अपन जीवन। परिवार कहियौ आकि लगक सम्बन्धित लोक, तइसँ जखन विरक्ति भऽ गेल तखन दोसर दिस वैरागीक बाट खुजिये गेल। खुजि गेल ई जे पचास बरख रहैबला कोठा माने मजगूत घर, जे अप्पन जिनगी भरिक कमाइसँ बनबै छैथ जे अपना पछातियोक पीढ़ीक एकटा भार मेटा देत, तैठाम आजुक परिवेशमे आधुनिकताक रंग चढ़बैत, बेटा ओकरा तोड़िकऽ रंग-रूप बनबै पाछू बेहाल अछि। यएह तँ छी जीवनक मूल तत्त्वक संग मजाक उड़ाएब..! खाएर जेतए जे होउ, अप्पन धियान शहरसँ गाम दिस भागि रहल छल।

 

ऐ साल माने अखन मई मास छी, मार्चक अन्तिम समयमे सातटा बैग, माने सात रंगक बैग, कीनने छेलौं आ पुरना बैग सभसँ एकटा कोठरीए अजबाइर अछि। पहिने केतौ एको दिन-ले जाइ छेलौं तँ अप्पन दाढ़ी बनबैबला रेजरक संग कपड़ा, टूथब्रश, खाइ-पीबैक वस्तु रखैत-रखैत बड़का बैग भरि जाइ छल, मुदा आइ से सभ नइ भेल। छोटका बैगमे एक जोड़ लूँगी, एक जोड़ धोती, तहिना गंजी-गमछा समेटि जखन तैयार भेलौं तखन पत्नीपर नजैर देलिऐन। बुद्धदेव जकाँ पत्नीसँ मुँह चोरा कऽ नइ ने भागब। बजलौं-

गाम जाएब।

पत्नी असमंजसमे पड़ि गेली। असमंजसमे ई पड़ली जे एक तँ बिना नियार-भासक एकाएक गाम जाइले तैयार होइत देखै छिऐन। मिथिला बंगलोर नइ ने छी जे धिया-पुता माने बच्चाकेँ पतिक कोरामे देबैन आ अपने बैग-झोरा लऽ कऽ आगू-पाछू उठि विदा हएब। माइक कोरामे जँ कोनो बच्चा मल-मूत्र तियाग करैए तँ ओ मातृभूमिमे समा जाइए मुदा पितृभूमि तँ पितृभूमि छी, जैठाम किछु बर्जित तँ अछिए। पत्नी बजली-

अहाँ पुरुख-पात्र छी, घरे भरिक विचारमे ने हम संग देब। अप्पन गाम जाइ छी, तइमे हम की कहब जे जाउ कि नइ जाउ।

पत्नीक मन सक्कत छेलैन्हे जे दू-दिन, चारि-दिन तँ बेसीकाल पति बाहरे रहै छैथ, तहिना ने गामो जेता आ औता।

 

पत्नीक विचार सुनि एकाएक मनमे उठल, आइये गाम पहुँचक अछि। आबा-गमनक सुविधा बढ़ने बंगलोर आ मिथिलांचलक दूरी चारि घन्टाक भऽ गेल अछि। तीन बजे बेरुपहर डेरासँ निकलब आ सात-आठ बजे तक गाम पहुँच जाएब। गामक सिनेह मनकेँ तेते सिनेहासिक्त कऽ देलक जे मनमे हुअए अखने गामक सीमानमे प्रवेश करी। उचटल-उचटल सन मन छेलए-हे, मुदा किछु समय तँ आरो डेरामे बितबए पड़त। मन वौड़ा रहल छल जे गामसँ की सोचि बंगलोर आएल रही आ आइ की लऽ कऽ गाम जा रहल छी? अप्पन जवानीक तीस बर्खक समय बंगलोरमे बितेलौं। जइ मातृभूमिक महत्व सदिकाल अकासमे लॉडस्पीकरक माध्यमसँ गूंजाइमान रहैए तइ समाज ले हम की केलिऐ? अपने मन अपना मनकेँ बुझौलक जे बीतल दिनक घटना बीतल दिनक बीतल भेल। गामक प्रति जिज्ञासा मनमे तेते प्रवल भऽ गेल जे बंगलोरक छिड़ियाएल जीवन मनसँ मेटा गेल। मनमे खाली गामेक जीवनटा रहल। समयानुसार डेरासँ निकैल हवाई जहाज पकड़ैले एयरपार्ट विदा भेलौं। परिवारमे पत्नीए टा बुझि रहल छेली जे गाम जा रहल छी, चारू बेटा तँ डेरामे छेलए-हो नहि, तखन बुझत केना।

जहाजमे जखन बैसलौं तखन ललित काका मोन पड़ला। जहिया गाममे रहैत रही, माने तीस साल पूर्व, तहिया ललित काका साठि बर्खक उमेर पार कऽ चुकल छला। हुनकासँ अन्तिम भेँट जहिया भेल, तहिया ओ कहने रहैथ, बौआ श्याम, अखन तक अपना ई नइ मोन अछि जे आइ धरि कहियो कोनो बीमारी छोड़बैले, माने रोग छोड़बैले, सूइया लेलौं अछि। विरले कहियोकाल कोनो गोटी खेने हएब। लगले अपने मनमे लाज उठल जे जखन अप्पन परिवारकेँ बंगलोरमे छोड़ि जा रहल छी तखन सभसँ पहिने हुनके (ललिते काका) ऐठाम जा अप्पन सभ बात कहबैन।

 

गाम पहुँचला पछाइत अपना ऐठाम नइ गेलौं। ओना, पितियौत भाइक परिवार सेहो छैन मुदा अप्पन मन ऐ विचारपर आरूढ़ छल जे जे ललित काका नब्बे बर्खक उमेर पार कऽ लेलैन आ अखनो ओहिना क्रियाशील छैथ, तैठाम अपने पचास बरख बितैत-बितैत मनमे होइए जे ऐ जीवनसँ मरबे नीक!’ तँए, सभसँ पहिने हुनकेसँ भेँट करब नीक।

ललित काका दरबज्जेपर बैसल रहैथ। मिथिलाक दरबज्जाकेँ सोल्होअना तँ नहि मुदा पनरहअना जरूर देवालयक धर्मशाला कहले जा सकैए। दरबज्जापर अतिथि-अभ्यागत देखि घरवारी अपन अहोभाग्य मनैबिते छैथ। बिना परिचय-पात भेनौं एक लोटा पानिक स्वागत करिते छैथ। ओना, आजुक परिवेश विषाक्त भइये गेल अछि, मुदा गामोक परिवेश सोल्होअना तँ मेटाएल नहियेँ अछि। ललित कक्काक दरबज्जापर पहुँचते प्रणाम करैत बजलौं- काका, गोड़ लगै छी, हम श्याम छी।

ओना, देखिते पहिने ललित काका ऊपर-निच्चाँ तजबीज करए लगला मुदा बजिते सोल्होअना चीन्ह गेला। ललित काका बजला-

बौआ श्याम, पहिने हाथ-पएर धुअ। हाथ-पएर धोने चाइलिक थकान मेटाइए। कहुना भेलिऐ तँ अपना सभ मिथिलाक मैथिल ने भेलिऐ। जहिना दूधकेँ मोहि मक्खन बनैए तहिना ने अपनो सभ माथकेँ मथि-मथि मैथिल बनल छी।

अप्पन मुँह बन्ने रखने रही। उमेर पेब एते तँ बुधि भइये गेल अछि जे अनका मुँहक बात बेसी सुनी। बजलौं- हँ से तँ छीहे।

एकाएक ललित कक्काक मन विश्वाससँ भरि गेलैन। तैबीच ललित कक्काक पोती- सुनीतिया, चाह नेने दरबज्जापर पहुँचल। दुनूगोरे माने अपनो आ ललितोकाका चाह पीलौं। ललित काका अखनो अपने हाथे पान लगबै छैथ। जहिना भानस केनिहारि भनसिया अप्पन मनोनुकूल भोजन बनबै छैथ तहिना अप्पन मनक अनुकूल ललित काका पान लगबै छैथ। ओना, मुँहमे दाँत एकोटा ने छैन मुदा चेहरा एते पुष्ट छैन जे टुटल दाँतक कोनो लक्षण ऊपरसँ नहियेँ देखि पड़ै छैन। पान लगबैत ललित काका बजला-

केहेन पान खाइ छह, श्याम? माने खिल्ली छोट कि पैघ?”

बजलौं- काका, पान नइ खाइ छी।

ललित काका बजला- हँ, आब तँ तूँ बंगलोर-वासी भऽ गेलह, तँए मिथिलाक रीति-रिवाज, माने मैथिलपन बिसैर गेलह।

ओना, मनमे हुअए जे कहिऐन- ‘काका आजुक परिवेशमे लोककेँ एते छुट्टी छै जे घन्टा-घन्टा भरि पानक दोकानपर लाइनमे लागल रहत आकि अपने हाथे जँ दसो बेर, माने दिन-राति मिला, पान लगौत तँ दू-तीन घन्टा समय ओहीमे देत। मुदा बजलौं किछु ने। बजलौं एतबे-

काका, किए एलौं से एकोबेर पुछबो ने करै छी।

ललित काकाकेँ जेना नैतिक क्रोध उठि गेलैन तहिना बजला-

बड़ बुड़िवान छह हौ, एहनो विचार कियो करैए जे दरबज्जापर आएल अभ्यागतकेँ पुछैन जे अहाँ किए एलौं। पुरुखक[3] दरबज्जा छी आकि मौगीक, जे पुछबह जे तूँ किए एलह?”

एक तँ ओहुना जँ कोनो भूल-चूक भऽ जाए आ श्रेष्ठजन जँ ओकर निवारण कऽ दैथ तँ मानि लेबाक चाही। बजलौं-

काका, जहिना लोक गीत-भजनमे गबै छैथ जे खाली हाथ एलौं आ खालीए हाथ चलि जाएब, तहिना अपनो भेल। जखन जवान भेलौं तखन गामक स्थितिमे सोच बनल, अप्पन समाज जे सामन्तशाही रहल, तइमे अधिकांश जन-गणक जे सोच बनैए, तइ अनुकूल अभावक जिनगी तँ छेलए-हे। तहूमे सभ कथुक अभाव, अन्न, वस्त्र, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि अधिकांश लोकक जहिना बनल आबि रहल अछि तहिना अपनो छल। तँए, अप्पन जीवन सुधारैले गाम छोड़ि बंगलोर गेलौं।

एकाएक बंगलोरक सीमामे अबिते विचार ठमैक गेल जइसँ बोलती बन्न भऽ गेल। चुप देखि ललित काका बजला- 

बौआ, चुप्प किए भेलह। गाममे एकटा कि तोहीं टा भेलह हेन जे बंगलोर गेलह, आकि जेठुआ उजैहिया कहक आकि धारक माछक अवारि जकाँ भेल अछि।

 

मनमे भेल जे अप्पन पेटक सभ बात कक्काक सोझामे उझैल दिऐन जे पाइक बलेँ जे सुन्दर जीवनक कल्पना केने छेलौं, सभ मटियामेट भऽ गेल। जैठामक, ऐठाम बेकतीसँ परिवार, परिवारसँ समाज आ समाजसँ देश-दुनियाँ अछि, श्रमशील शक्ति जेतेक प्रवल होइत जाएत ओइठामक बेकतीसँ समाज धरि ओतेक आगू बढ़त माने ऊपर चढ़त आ जैठामक श्रमहीन शक्ति जेतेक अथवल होइत जाएत ओइठामक बेकतीसँ समाज धरि ओते मटियामेट होइत जाएत। मुदा से सभ किछु ने बजलौं, ओ ऐ दुआरे जे ललित कक्काक विचार जानए चाहि रहल छी। सोल्होअना मन कबूल कइये नेने अछि जे नब्बे बरख टपला पछातियो ललित काकामे वएह सोचो आ विचारो, आइयो ओहिना मनमे प्रवाहित भऽ रहल छैन जे जीवनक शुरूआतमे छेलैन। एक तँ ओहुना आजुक परिवेशमे नब्बे बरख जीब लेब ठट्ठा नहियेँ छी, मुदा विचारक संग टकुआटान जीब लेबे ने जीवनक सार्थकता छी। ललित कक्काक आगूक विचार बुझै दुआरे बजलौं-

काका, आब गामेमे रहब।

मुस्कुराइत ललित काका बजला- आब तोरा सबहक बास गाममे थोड़े हेतह।

पुछलयैन- से किए काका?”

ललित काका बजला- “ई नइ बुझल छह जे मिथिलाक गाम महादेवक त्रिशूलपर अछि।

केते गोरेक मुहेँ सुनने जरूर छी, मुदा महादेवक त्रिशूलपर अछि, से बुझिये ने रहल छी। बजलौं- से केना काका?”

ललित काका बजला- जहिना देशमे एकदिस सामन्ती विचार आ काज चलि रहल अछि, तहिना दोसर दिस पुरान पूँजीपतिक, माने पूर्वक जरूरतक अनुकूल जिनकर कारोबार छेलैन आ नव पूँजीपति, जे नव मशीनक संग नव जीवन गढ़ए चाहि रहल अछि, जेकर फलाफल देखिते छहक, टाटा-बिड़लाकेँ, जे किछु दिन पूर्व तक देशक सभसँ पैघ पूँजीपति छला, आइ ओ बहुत पाछू पड़ि गेला। अही त्रिशूलमे अपनो सभ आ समाजो लसकल छी।

ललित कक्काक विचार सुनि मनमे भेल जे किए ने ललित काकाकेँ दसम दशकक वा सइयम दशकक बधाइयो दइये दिऐन। बजलौं-

काका, टकुआटान जिनगीक लेल अपनेकेँ बधाइ।

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शब्द संख्या : 2302, तिथि : 19 मई 2023




[1] साए रूपैआक नोट

[2] दू हजरिया

[3] पौरुषक

आजुकजीवनआजुकसाहित्य

 धरतीपर माने दुनियाँमे, जहिना सात अरब लोक छैथ आ सातो अरब लोककेँ अप्पन-अप्पन इच्छा सेहो छैन तहिना अपनो तँ अछिए। किए ने रहत, जहिना सबहक सझिया दुनियाँ छिऐन तहिना अपनो हिस्साक तँ छीहे। मुदा तइमे एकटा बात आरो अछि, ओ अछि जे सात अरब लोकक सात अरब इच्छा जरूर छैन, मुदा सात अरब रंगक जीवन तँ नहि अछि। ओना, अप्पन-अप्पन जीवन सबहक छैन, मुदा समाजमे रहने सभक जीवन समटा गेल अछि। जइसँ रंग-रंगक जीवन रहितो, एकरंगाह बनियेँ गेल अछि। माने ई जे डॉक्टरी ज्ञान आ पेशा, डॉक्टरक श्रेणी समाजमे जहिना बना देने छैन तहिना आरो-आरोक बनियेँ गेल छैन। बनबो केना ने करतैन, मानि लिअ अहाँ बेटाक मूड़नक भोज हम खेलौं, तहिना अपनो बेटाक मूड़नक भोज अहाँकेँ खुआएब अछि किने, जँ से नहि करब, तखन कर्मगत जीवन मनुक्खक भेल केना। मनुक्ख सामाजिक प्राणी छी तँए समाजक संग चलइ पड़त। समाजक जीवन पशु जकाँ मनुक्खक थोड़े अछि।

बाबाक अमलदारीमे जखन अप्पन जन्म भेल तखन बाबा गार्जन छला। हुनके विचारे परिवार चलै छल। जहिना माए छेली तहिना बाबूओ छला। दादीक परम भक्त माए छेली आ बाबाक भक्त बाबू। जहिना भगवानक भक्त सोल्होअना भगवानपर ओङ्गैठ जाइ छैथ तहिना पितोजी आ माइयो बाबा-दादीपर ओङ्गठल रहैथ। ऐठाम ई नइ बुझब जे द्वापर युगमे महाभारतक लड़ाइयक दुनू खेमामे माने कौरवो आ पाण्डवोक खेमामे रणनीतिपर विचार चलि रहल छल आ अर्जुन नीन भेल सुतल छला तहिना पितोजी आ माइयो सुतल रहैथ। जहिना अर्जुन कृष्णपर ओङ्गठल छला तहिना माता-पिताजी बाबा-बाबीपर, माने कर्म जहिना ज्ञानपर ओङ्गैठ जाइए तहिना।
किसान परिवारमे जन्म भेल अछि। अप्पन वंशक इतिहास तँ बेसी बुझल नहि अछि जे गाममे कहियासँ बाँस भेल, केना परिवार बनल आ केना कोन रूपक जिनगी बना पूर्वज अप्पन परिवारकेँ ठाढ़ केलैन, मुदा तीन पीढ़ीक तँ बुझल अछिए।
माता-पितासँ बच्चामे ओते सम्बन्ध नहि बनल छल जेते बाबा-दादीसँ रहल। परिवारसँ निकैल खेत-पथारमे माइयो आ बाबूओ काज करए जाइ छला। जहिना दादी परिवारक काज सम्हारै छेली तहिना बाबा खेती-पथारीसँ लऽ कऽ दुआरो-दरबज्जा आ खुट्टा परक मालो-जालक तकतियान करै छला। बाबूकेँ जे काज सुमझा दइ छेलखिन ओ काज बाबू अप्पन अभ्यासानुसार करैत रहैथ। तँए मनमे एहेन कोनो चिन्तो ने रहै छेलैन जे कोन धानक बीआ कोन नक्षत्रमे पाड़ल जाएत आ कोन रूपक फलक गाछ कोन मासमे जनमबो करत आ ओकरा रोपलो जाएत। तहिना तीमनो-तरकारीक आ दरबज्जापर लगल फूलोक छेलैन।
आने-आन मनुक्ख जकाँ माइयो-बाबूकेँ एहेन भ्रम छेलैन्हे जे जहिना अखन माता-पिताक देख-रेखमे छी तहिना सभ दिन रहब। सभ दिन ओहो रहबे करता आ अपनो रहबे करब। ओना, बर-बेमारीक संग आन-आन माए-बापकेँ मरितो देखिते छेलखिन मुदा तैयो तहिना बुझै छला। भ्रमक कारण ई छेलैन जे कियो साँप कटलासँ जँ मरैए आकि केंसर सन रोगसँ, जेकरा साँप काटत आकि जेकरा केंसर हएत ओ ने मरत। आ जँ अपना ने साँप काटए, ओते सहचेत रही, आ ने केंसर हुअए, तखन मरब किए।
तीन बीघा खेतक किसान बाबा छला। दू बीघा अन्नक खेती करैत रहैथ, बाँकी एक बीघामे घर-घराड़ी, दुआर-दरबज्जासँ लऽ कऽ मालक थैर, अन्नक खरिहाँन, खढ़क खरहोरि, गाछी-कलम सभ मिला कऽ छेलैन।
ऐठाम एकटा बात अछि। गाछी-बिरछी, कलम-बाग, गाछ-बिरीछ आ कलम-गाछक बीचक अन्तर, माने दूरी। जैठाम गाछक समूह भेल ओ भेल गाछी, ओना आनो-आन माने एकसँ अधिक किस्मक गाछक समूह सेहो गाछी भेबे कएल। मुदा बाबाक अमलदारीमे जे अपना परिवारमे छल, से कहै छी। आमक मासकेँ गुनि, तीन मासक फल आमकेँ मानि नेने छला। तीनू मासक हवा-पानि-ताप तीन रंगक अछिए। तीन हिस्सामे आमक मासकेँ मानि तीन रंगक तीनटा आमक गाछ रोपने रहैथ। बुझल अछिए जे जहिना आम-लोक आमक राजा होइए तहिना आमक फल सेहो फलक राजा छीहे। समय पकड़ाएल तँ खूब फड़त, जँ से नहि पकड़ाएल तँ सपतो खाइले नहि रहत। खाएर जे से, बाबाक समटल परिवार छेलैन। जाबे धरि अपने जवान भेलौं, माने दुरागमन भेल, ताबे धरि पाँचे-छह गोटेक परिवार छल। मुदा अपना अमलदारीमे परिवारमे लोकक बाढ़ि आबि गेल। दुनू परानीक मन मानिते अछि जे बेटा रत्न छी, मुदा भेटैए केकरो-केकरो। फेर अपने मनमे ईहो हुअए जे रत्न तँ बनौलो जाइये सकैए। नमहर आशा मनमे छेलए-हे। बाबाक जहिना अपने तेसर पीढ़ी भेलौं तहिना परिवार सेहो तीन गुणा बढ़िकऽ भऽ गेल अछि।
अप्पन सम्पैतकेँ माने खेतकेँ बाबा अप्पन जीवनमे बान्हि चलबै छला। छोट परिवार छेलैन्हे, जहिना खेबामे शौकिन रहैथ तहिना उपजबैयोमे रहबे करैथ। भाय, जखन अपना हाथे खेती करब तखन अप्पन मनोनुकूल किए ने करब। बाबा अप्पन जीवनकेँ काटि-छाँटिकऽ अप्पन पारिवारिक जीवन बनौने छला। माने ई जे सइयो रंगक अगहनी धानमे मात्र दुइये रंगक धान उपजबै छला। चूड़ा ले वासमती आ भात ले तुलसीफुल। भाय, अपना सभ मैथिल छी किने। मैथिल परिवार ओहन परिवार अछिए, जइमे एक साँझ चूड़े खेबाक चलैन अछि। ई दीगर जे दहीक संग चूड़ा कि दालि-तरकारीक संग चूड़ा आकि भुजल-भिजौल चूड़ा।
बाबाक देखा-देखीसँ अपनो जीवन ओहने बनेबाक विचार मनमे रोपि ओइ पाछू लागि गेलौं। हुनके अमलदारीकसँ माने बाबाक अमलदारीक अन्नो, फलो-फलहरी आ तीमनो-तरकारीक बीआ-बाइल अपने बनबै छी आ साले-साल खेती करै छी। ऐठाम ई नइ बुझब जे मिथिलामे साग-पातसँ लऽ कऽ फलो-फलहरी आ अन्नो-पानिक चर्च दुनियाँक वायुमण्डलमे नइ गनगनाइए, सेहो तँ गनगनाइते अछि। मुदा बाबाक अमलदारीमे जे रूप-गुण आ सोभाव ओइ सभक, माने अन्नो आ फलो-तरकारीक छल, तइमे मिसियो भरि सुधार नइ भऽ सकल। जाँतक तरौटा जकाँ अखनो ओहिना मिथिला गाड़ल अछि जेना पूर्वजक बीच छेलैन। दुनियाँक नामी आम मालदह, पार्वतीक छाती स्वरूप बेल, लक्ष्मी-सरस्वतीक दाँत सन दानादार दारीम आ कागज सन कागजी नेबो इत्यादि-इत्यादिक रूप-गुणमे की नवपन आएल आकि ओ उपैट रहल अछि.!
#टकुआटान, कथा संग्रह, 2023, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, पल्लवी प्रकाशन, पृष्ठसंख्या: 55-56


Tuesday, June 6, 2023

बासभूमि, जगदीश प्रसाद मण्डलक 841म कथा

 #बासभूमि ©

✍️Jagdish Prasad Mandal
सूर्यास्त भऽ गेल मुदा अन्हारक कोनो लक्षणक आगमन नहि भेने दिने जकाँ मौसम साफ।
तीन कट्ठा बरसाती बैंगन केने छी, ओकरे कमठौन कऽ आएले रही, खुरपी हाथमे रहबे करए कि दुनू बापूत ललित भाय पहुँचला। ललित भायकेँ देखि बजलौं-
“भाय, अहाँ चौकीपर बैसू, हम कने खुरपी रखि हाथ-पएर धोइ अबै छी, पछाइत गप-सप्प करब।”
जहिना बजलौं तहिना दुनू बापूत ललित भाय दरबज्जाक ओसारपर राखल चौकीपर बैसला। अपने खुरपी रखि बेटीकेँ शोर पाड़लिऐ। जहिना शोर पाड़लिऐ तहिना राधा आँगनसँ आबि पुछलक-
“की कहै छी?”
कहलिऐ-
“चाह बनौने आबह। ताबे हमहूँ हाथ-पएर धोइ लइ छी।”
बिना किछु बजनहि राधा चाहक ओरियानमे आँगन गेल आ अपने चापाकलपर जा हाथ-पएर धोइ, पानि पीब दरबज्जापर आबि ललित भाइक बगलेमे चौकीपर बैसलौं।
ओना, चेहरा-मोहरासँ देवकान्तकेँ चिन्हते छेलिऐ, माने ललित भाइक बेटाकेँ, मुदा परदेश गेने चेहरो-मोहरा आ चालियो-ढालि तँ किछु-ने-किछु बदलिऐ गेल अछि तँए चिन्हैमे कनी दुविधा भेल।
चौकीपर बैसिते राधा चाह नेने आएल। ओना, तीनू गोरेले चाह अनने छल मुदा देवकान्त चाह पीबैसँ इन्कार करैत बाजल-
“काका, हम चाह नइ पीब।”
देवकान्तक मुहसँ ‘नहि’ सुनि मनमे भेल जे भरिसक शिष्टाचार दुआरे देवकान्त चाह पीबैसँ इन्कार करैए। ओना, आजुक जे परिवेश बनि गेल अछि तइमे एहेन शिष्टाचार मेटा गेल अछि। ओना, केतबो मेटा किए ने गेल अछि मुदा बेकती-विशेषमे अखनो जीवित अछिए। बजलौं-
“देवकान्त, खेबा-पीबामे नइ लजेबाक चाही। आब ओ युग-जमाना रहल जे लोक चाहकेँ पेय पदार्थ बुझि अपनासँ श्रेष्ठ लग नइ पीबै छल। आब तँ चाहक रूपेँ बदैल गेल अछि, जहिना कलौ-जलखै लोक करैए, तहिना चाहक चलैन परिवार-परिवारमे भऽ गेल अछि।”
देवकान्त किछु बाजल नहि, मुदा एते जरूर केलक जे जखन हम दुनू गोरे माने हमहूँ आ ललितो भाय, चारि-पाँच घोंट चाह पीब लेलौं तेकर पछाइत देवकान्त चाहक कप उठा मुँहमे लगेलक।
ललित भाय पुछलैन-
“खुरपीक कोन कारबार करै छेलह, मकशूदन?”
ललित भाइक विचार सुनि बजलौं-
“भाय, कारबार की करब, जुआ खेलाइ छी।”
ओना, ललित भाय भीतरसँ जानि रहला अछि जे मकशूदन मेहनती लोक अछि। आइ धरि ने ओ दिवाली पावनिक अवसरपर कहियो जुआक पाशपर बैसल अछि आ ने कोजगराक शिव-पार्वती जकाँ पचीसीक कौड़ी भँजलक अछि, तखन कोन जुआ खेलाइए? ललित भाय बजला-
“से की, मकशूदन?”
बजलौं-
“भाय, पैछला साल लोकक देखा-देखीसँ अपने जही चौमासमे ऐबेर बैंगन रोपने छी तही चौमासमे पैछलो साल बैंगनक खेती केने रही। ओना, पहिनौं करै छेलौं मुदा ओ करै छेलौं अप्पन देशी बैंगनक खेती, जे जेठ-अखाढ़मे रोपै छेलौं आ कातिकसँ फड़ब शुरू होइ छल। अपने खेतमे टेब-टेब बीओ रखै छेलौं आ अपने हाथे ओकरा बनैबतो छेलौं। मुदा पैछला साल लोकक देखसियो आ कहलोपर बरसाती बैंगनक खेती केलौं। माने ई जे रोपलापर चालिसे दिनक पछाइत फड़ए लगैए जइसँ अगता भेने बिकरियो-बट्टा नीक होइए आ महगो बिकाइए। मुदा..!”
जेना ललितो भाय खेतीकेँ अख्यिाइस रहल छला तहिना बजला-
“मुदा की?”
बजलौं-
“भाय, एक तँ अपना हाथक बीआ अनका हाथमे चलि गेल, दोसर तेते ने कीड़ी-फतिंगीक आगमन भेल जे बेचैक कोन गप जे अपनो परिवारमे एको साँझ निरोग बैंगनक तरकारी नइ भेल।”
ललित भाय बजला-
“नीक जकाँ तरद्दुत नइ केने छेलहक?”
बजलौं-
“भाय की कहब, जहिना लोक बजैए जे महींसक नफ्फा चरवाहीमे गेल तहिना भेल।”
ललित भाय बजला-
“से की?”
बजलौं- “जहियासँ बैंगनक खेती शुरू केलौं तहियासँ रेडियो स्टेशनसँ खेती-बारीक कार्यक्रम सेहो सुनए लगल छी।”
अप्पन मनक बात ललित भाय नहि बुझलैन, मुदा अप्पन मनक बात मनक टुगनीपर रहबे करैन। जहिना बजलौं तहिना ललित भाय चपचपाइत बजला- “वाह-वाह.! मकशूदन, यएह छी कुशलता अनैक दिशा.!”
अपना जनैत ललित भाइक मुँहक बात अमृतवाणी कहियौ कि अमरवाणी सन रहैन मुदा नइ बुझने, बजलौं- “से केना ललित भाय?”
गम्भीर विचारक जकाँ ललित भाय बजला- “जखने कियो अप्पन काजक संकल्प लैत काजमे हाथ लगबैए आ मनकेँ काजक रूप पकड़ैमे लगबैए, तखने ओकर काजक सफलताक दशाक दिशा खुजैए जइसँ जहिना सफलताक इच्छा जगैए तहिना सफलता रसे-रसे एबो करैए। सफलता केतौ बाहरसँ अबैए से बात नहि छै, काजक बिच्चेमे सफलता अछि।”
ललित भाइक विचार सुनि कखनो मनमे ईहो हुअए जे भरिसक कोनो फल जकाँ, माने आम, जामुन, लताम इत्यादिमे जहिना बीआ भीतरमे रहैए तहिना भरिसक काजक भीतरेमे सफलताक बीआ सेहो अछि। मुदा लगले अपना मनमे ईहो हुअए जे आम-जामुन आकि लताम आदि भगवानक बनौल छिऐन मुदा काज तँ अप्पन बनौल छी, तखन से केना हएत? कखनो मनमे ईहो हुअए जे जहिना बुद्धदेव दू-अढ़ाइ हजार बरख पूर्व भेला आ आइयो लोक हुनका ओहिना देखै छैन तहिना ने बुद्धिदाता सेहो छैथ। मन अगदिगमे पड़ि गेल। बजलौं-
“से केना भाय?”
मात्र एगारह धुर घराड़ीमे अप्पन बासभूमि रहितो ललित भाय काजक तेतेक जोगारी छैथ, अनेक रंगक काज, जे अप्पन स्वतंत्र जीवन धारण केने छैथ, जइसँ अप्पन स्वतंत्र विचार सेहो छैन। ऐठाम स्वतंत्र विचारकेँ मनमाना विचार नइ बुझब। मन-मानाक माने भेल जखन जेहेन मन रहल तखन तेहने बजबो केलौं आ करबो केलौं। से नहि, स्वतंत्र विचारक माने भेल निर्विचार, जे केकरो एकतरफा नइ होइए, सबहक एक्केरंग होइए। ललित भाय बजला-
“मकशूदन, ऐठाम विश्वामित्रक सिरजन नइ बुझिहह, ऐठाम एतबे बुझह जे समाजमे अधासँ बेसी लोक ओहन अछि जे जीवनक अप्पन मूल आवश्यकताक पूर्ति भगवानक भरोसपर छोड़ने अछि आ अधासँ कम अपना हाथमे रखने अछि।”
ओना, ललित भाइक विचार बुझैले मने-मन योग करिते रही मुदा देखौआ योग केनिहार जकाँ ऊपरका। माने हलुकाहा योग तँ हुअए मुदा भीतरिया योगक पूर्ति भेबे ने कएल। ओ तँ होइए भरिगरहा मनक योग बनौने, जैठाम शब्देक खेलो अछि आ शब्देक वाणसँ राजो-पाटक छीना-झपटी अछि तैठाम खाली गप-सप्पसँ नइ ने हएत। तँए ने कबीर दास खिसियाकऽ कहलैन जे ‘ने किछु देखलौं पाँचो लाख मंत्रक अठारहो पुराणमे आ ने किछु देखलौं संगमरमरसँ बनल बहुमंजिला मकानमे, तँए भाय कहै छी, जे जे अछि ओ रोटीक पपड़ा तरमे नुकाएल अछि।’
..बजलौं- “से केना भाय?”
तइ बिच्चेमे ललित भाइक विचार जेना पाछू दिस घुसैक गेलैन, अकचकाइत बजला-
“की रेडियो स्टेशन कहलहक?”
ओना, अप्पन मन जीवनक मूल बुझै दिस प्रवाहित भऽ रहल छल मुदा एकाएक ललित भाय पहिलुका सुनल रेडियो स्टेशनक चर्च उठा देलैन। आगूसँ केना कहितिऐन जे पहिने जीवनक मूल कहि दिअ पछाइत रेडियो स्टेशनक कहब। अप्पन सामंजस करैत बजलौं-
“भाय, हम्मर प्रश्न बाँकीए अछि।”
जहिना अपने बजलौं, ‘भाय, हम्मर प्रश्न पछुआएले अछि’, तहिना ललित भाय सेहो बजला- “अपने जइ काजे आएल छी तेकर तँ अखन तक चर्चो ने भेल अछि, तइले कोनो अगुताइ अपना मनमे अछिए नहि आ तूँ लगले औगता गेलह.!”
संयोगसँ तइ बीच राधा दोहरा कऽ चाह नेने आएल। ऐठाम दोहराकऽ चाह अनैक प्रश्न अछि। अपना सभ गाम-समाजक लोक छी, चाहक ने ओते खगता अछि आ ने ओइ पाछू बेहाले छी। एक बेर जँ भिनसरमे पीब लइ छी तँ साँझेमे पीबाक इच्छो होइए आ परिवारमे तहिना बनितो अछि। मुदा आजुक जे वैचारिक समाज, वैचारिक समाजक माने भेल परिवारसँ आगू बढ़ि समाज आ देश-दुनियाँक विचार करैबला समाज, जीवनक पद्धतिकेँ बदलबे करैए। ऐठाम बंगालक भाँड़ीक चाह नइ कहै छी जे ओ सभ लगले-लागल पीबै छैथ। हुनका सभसंग दुनू समस्या छैन, एक तँ अपना सभसँ पानि मन्द छैन आ दोसर ओ सभ शारीरिक श्रमसँ बेसी मानसिक श्रम करै छैथ, जइसँ मनकेँ तरोताजा बनबै दुआरे सेहो लगले-लागल चाह पीबै छैथ। अपनो परिवारमे एहेन चलैन बनियेँ गेल अछि जे जखन दू-चारि-पाँच गोरे एकठाम बैस कोनो समस्याक वैचारिक समाधान करैक दिशामे गप-सप्प करै छी तखन बीच-बीचमे चाह-पान सेहो चलिते अछि।
तइ बीचमे ललित भाय चाह पीब गिलास राधाक हाथमे पकड़बैत बजला- “बुच्ची, पानमे टूक सुपारी नइ दिहक। जँ सरोतासँ कतरा बनौल हुअ तँ सेहो बड़बढ़ियाँ नइ तँ सिलौटपर लोढ़ीसँ थकुचि दिहक।”
तैबीच अप्पन मन असथिर पानि जकाँ समगमक स्थितिमे पहुँच गेल छल। समगम पानि भेल, जइमे डुबैक डर नइ रहल आ अप्पन जीवनक उपयोगी काज कऽ रहल छी। बजलौं-
“भाय, जखन रेडियो स्टेशनसँ बैंगन-खेतीक चर्च निसचित रूपेँ सुनए लगलौं तखन मन एते उताहुल भऽ गेल जे बैंगनक खेती छोड़ि दोसर किछु ने करब। एते दिन ने एक फसिला, माने एक सीजनक फसल, बैंगनक उपज छल, आब तँ बारहो मासक भऽ गेल अछि, तखन किए ने सालो भरि एक्के रूपक कर्म करी।”
गम्भीर विचारक ललित भाय छथिए। बजला- “मकशूदन, पहिने रेडियो स्टेशनक विचार कऽ लएह। अखन तक भलेँ तूँ नइ मुहसँ निकाललह हेन जे बैंगनक खेतीमे की सभ समस्या भेलह। केतए कोन काज करक चाही आ बुझै बिना करबे ने केलह।”
ललित भाइक विचार मनमे गड़ल। मुदा करितौं की, पैछला सालक खेती बित गेल। बजलौं-
“पैछला सालक खेतीमे सएह भेल भाय, खेतक उपज तँ गेबे कएल जे अप्पन मेहनतो आ खरचो सभ बुड़ि गेल!”
ब्रह्मज्ञानी जकाँ ललित भाय बजला- “मकशूदन, अज्ञान बड़का पाप सेहो छी आ धर्मक जनक सेहो छीहे। अज्ञानेसँ ज्ञानक जन्म होइए, तँए सृजनकर्ता सेहो छी। लोक कृष्णकेँ माने कारीरूप—अज्ञान—केँ सभ देवतासँ ऊपर अही कारणेँ ने बुझै छैथ।”
रेडियो स्टेशन सुनिते ललित भाइक नरसिंह जेना हुमरलैन, जइसँ बोलीमे कर्कशपन एलैन। बजला-
“बौआ मकशूदन, अपना ऐठाम माने अपना देशमे नब्बेसँ ऊपर रेडियो स्टेशन ओहन अछि, जइसँ खेती-पथारीक समाचार हिन्दी वा अन्य क्षेत्रीय भाषामे प्रसारित होइए, मुदा तोहीं कहह जे आधुनिक ढंगसँ जेहेन खेती हेबा चाही तैबीच दूरी अछि कि नहि?”
अपने तँ दरभंगा रेडियो स्टेशन छोड़ि दोसर स्टेशन सुनै नइ छी तखन देशक आन रेडियो स्टेशनक बात बुझब केना। बजलौं-
“भाय, अहाँक विचार नीक जकाँ नइ बुझलौं।”
तैबीच मने-मन जेना ललित भाइक नरसिंह आरो ऊपर चढ़ि गेलैन। मुँह बिजकबैत बजला-
“भोरुपहर-के खेतीक समाचार सुनै छह?”
अपने तँ मात्र समाचर सुनैले रेडियो सुनै छी जे चाहे राजधानी दिल्लीक समाचार होउ आकि पटनाक, खेल-कूदक समाचार होउ आकि नाच-तमाशाक, सभकेँ समाचार बुझि सुनि लइ छी। ई थोड़े बुझै छी जे मुख्य समाचारमे खेती-बारीक समाचार अखनो धरि नइ आएल अछि तँए ओकर हाल-चाल के बुझत। बजलौं-
“नइ।”
ठोह फाड़ि ललित भाय बजला-
“भोरू पहर-के जखन खेतीक समाचार सुनबहक, तखन सुनबहक जे कोनो अन्नक खेतीक जखन शुरूआती अवस्था रहैए तखन ओकर भण्डारण केना हएत। यहए तँ छी रेडियो स्टेशनक मरजाद।”
ललित भाइक मनक वेग देखि बुझि पड़ल जे कोसी-कमला धारक बाढ़ि जकाँ कहीं रस्तेपर ने मोइन फोड़ि दैथ, तँए विचारमे मोड़ दैत बजलौं-
“भाय, सुनै छी जे बैंगनक तीमन-तरकारी आकि भुरता-तरूआ खेने हौहैट-कलकैल भऽ जाइए, तखन तँ लोक अनेरे ने बैंगनक खेती करैए।”
खेबा-पीबाक बीह बुझनिहार डॉक्टर जकाँ ललित भाइक विचार सेहो जगलैन। बजला-
“मकशूदन, बैंगनमे की गुणधर्म अछि से सुनि लएह। प्रति सौ ग्राम, खेबा-जोकर बैंगनमे, 2.2 मिलीग्राम विटामिन- ‘सी’, 0.3 मिली ग्राम विटामिन ‘ई’, 3.5 माइक्रो ग्राम विटामिन ‘के’, 0.039 मिलीग्राम विटामिन- बी1 ‘थायमिन’, 0.036 मिलीग्राम विटामिन- बी2 ‘रिबोफ्लेविन’, 0.649 मिलीग्राम विटामिन- बी3 ‘नियासिन’, 0.281 मिलीग्राम विटामिन- बी5 ‘पैन्टोथेनिक एसिड’, 0.084 मिलीग्राम विटामिन- बी9 ‘फॉलेट’, 0.023 मिलीग्राम ‘लौह’, 9 मिलीग्राम ‘कैल्शियम’, 14 मिली ग्राम ‘मैग्नेशियम’, 0.232 मिलीग्राम ‘मैंगनीज’, 24 मिलीग्राम ‘फॉस्फोरस’, 239 मिलीग्राम ‘पोटेशियम’, 0.16 मिलीग्राम ‘जिंक’, 0.9 ग्राम ‘प्रोटीन’, 0.18 ग्राम ‘बसा’, 5.88 ग्राम ‘कार्बोहाइट्रेट’, 3.53 ग्राम चिन्नी, 1.3 ग्राम ‘रेशा’ आ 25 किलोकैलोरी ऊर्जा भेटैए।”
ललित भाइक विचार सुनि मन तेना हरिया गेल जे हरहराइत मुहसँ बजा गेल-
“भाय, उजरा बैंगन छोड़ि कऽ कहै छी आकि लगा कऽ?”
अपना ऐठाम एकटा कहबी अछिए जे ‘अनका लोक उजरा बैंगन खाइसँ मनाही करैए आ अपने खाइए’।
तैबीच ललित भायकेँ देवकान्त आँखिक इशारासँ कहलकैन जे जइ काजे आएल छी, तेकर चर्चे ने कऽ रहल छी आ दुनियाँ-दारीक गप-सप्पमे मतंग भऽ गेल छी। बेटाक इशारा पेब ललित भाय बजला- “एकटा काजे आएल छी, मकशूदन।”
ललित भाइक विचार सुनि मन ठमैक गेल। ठमकैक कारण भेल जे जे ललित भाय अपने ओहन जीवनानुभवी छैथ जे एक नहि अनेको रंगक जीवनकेँ रग-रग बुझै छैथ, तैठाम किए पुछए एला? मुदा सुहरदे मुहेँ केना कहितिऐन जे अपने तँ ओहन अनुभवी बेकती छी जे अनको जीवन दान करै छी आ...। तँए मनक विचारकेँ मनेमे दाबि ललित भाइक विचारकेँ खोधियबैत बजलौं-
“केहेन काजे आएल छी, भाय साहैब?”
जहिना रचनाकार अप्पन रूचित विचारकेँ रचित करैसँ पहिने भूमिका (चौहद्दी) बान्हि रचना करै छैथ तहिना ललित भाय बजला-
“मकशूदन, तोरा बुझल हेतह कि नहि, तँए पहिने कहि दइ छिअ।”
ललित भाइक विचार सुनि अप्पन मनकेँ जगबैत बजलौं-
“भाय, जँ बुझलो रहल हएत तँ से धियानपर नइ अछि, बिसैर गेलौं, दोहरा कऽ कहियौ।”
ललित भाय बजला-
“बाबाक अमलदारीमे अप्पन नीक परिवार छल, माने आठ बीघा जमीन छल। मुदा अपना तक अबैत-अबैत ओ राँइ-बाँइ भऽ टुटि गेल।”
ललित भाइक विचारक भाव तँ थोड़-बहुत बुझलौं मुदा राँइ-बाँइ केना भेलैन, से बुझबे ने केलौं। अप्पन मन मानिते अछि जे कोनो काज, चाहे ओ वैचारिक हुअ आकि क्रियागत, जेते ओकर तहक तहियाएल रूपकेँ सुनि-बुझि करब तेते नीक रूप ओकर होइते छइ। बजलौं-
“भाय, कनी फरिछा कऽ कहियौ।”
मन जहिना अप्पन चोटाएल वा मरियाएल विचारकेँ दोसराक मनमे प्रवेश करबैकाल खुशी होइए तहिना ललित भाइक मनमे सेहो भेलैन। ओना, ललित भाइक अप्पन मन मानिते छैन जे दुनियाँ चलायमान अछि, ओ अपना गतिये चलबे करत। मुदा जीवनो तँ जीवन छी, तहूमे मनुक्खक जीवन। जेकरा बुधि-विवेक छै, कर्म-शील अछि आ धैर्य-धारणक क्षमता आदि सभकिछु छै, ओ आन जीव-जन्तु जकाँ नइ ने अछि। आनो-आन जीव-जन्तुमे प्राण-शक्ति छै मुदा मनुक्ख जकाँ ज्ञान-शक्ति तँ नइ छै जे अप्पन जीवनकेँ परिमार्जित करैत आगू दिस बढ़त। ओ तँ मनुक्खेटा मे अछि।
ललित भाय बजला-
“अपना ऐठाम स्वतंत्रतासँ पूर्व, माने 1947 ई.सँ पहिने, जमीन-जत्थामे लूटि मचल छल। अखनो अछि, मुदा ओ अछि दोसर रूपमे, से अखन नइ कहब। अप्पन परिवारक जे बितल अछि सएह कहै छिअ।”
ललित भाइक विचार सुनि अपनो मन मानि गेल जे अनेरे बीच अँगनामे बैस मेघक तरेगन जे गनैत रहब तइसँ की भेटत। एक्केबेर मानि लेब जे माथमे जेतेक केश अछि मेघमे तेते तरेगन अछि। बजलौं-
“भाय साहैब, अनेरे दुनियाँक चक्करमे किए पड़ब। अप्पन चक्करकेँ पकैड़ चासिकऽ चौरस बनबैत चलैत रहू।”
ललित भायकेँ जेना वैचारिक सह भेटलैन तहिना बजला-
“जहिना बाबा सुभ्यस्त किसान छेला तहिना जमीनक निलामीक पछाइत एकाएक बेलल भऽ गेला। सभ किछु माने उपार्जित सम्पैत, हाथसँ निकैल गेलैन। मुदा दादी बड़ जीबठगर रहैथ, ओ बाबाकेँ कहलैन जे ‘जे भगवान मुँह चीर पैदा केलैन तिनकर बड़कासँ खेनाइ-पीनाइ लेबैन। अनेरे एते चिन्ता किए करै छी। केकरो मारने मरि जाएब, आकि अप्पन करनीसँ मरब-जीअब।’ अर्द्धस्वरूपा संगीक सह पेबिते जहिना केकरो मनमे शक्तिक आगमन होइए तहिना दादीक विचार सुनि बाबाकेँ सेहो भेलैन। अप्पन पचासी बर्खक जीवन मौज-मस्तीसँ बितौलैन। ओइ पीढ़ीक अन्त भेल, दोसर पीढ़ीमे बाबू-माए भेला। ओहो अप्पन जीवन ओहिना बितौलैन जेना अभावमे अभावी मनुक्खक जीवन होइए। तेसर पीढ़ीमे अपने छी, साठि बरख पार कइये लेलौं, तँए आब जीवनक कोनो ढुनि-ढेकार अछिए नहि।”
निर्लोभ, निरुद्देश्य ललित भाइक विचार सुनि मनमे भेल जे किए ने पुछिऐन जे जखन कोनो खगता जीवनमे नहि अछि तखन कि पुछए एलौं। मुदा लगले अपने मन रोकि विचार देलक जे किए ने ललिते भाइक मुहसँ सुनि ली। बजलौं-
“भाय, अपने कोन जोकर छी जे अहाँक..?”
ललित भाय बुझि गेला। बजला-
“मकशूदन, ओना अधला विचार लोक लग बजैमे संकोच होइए मुदा जँ निधोखसँ बाजी तँ एते तँ होइते अछि जे नीक-अधलाक बीचक खादिकेँ देखबैत लोक अप्पन विचार दइ छैथ। जइसँ अधलाक प्रति अंकुश लगिते अछि।”
ललित भाइक विचार मनमे जँचल। बिनु विचारनहि मुहसँ खसि पड़ल-
“अधला ने अधला भेल तँए ओकर परिमार्जन हएत, मुदा नीक विचार आकि नीक काजकेँ बजैक कोन खगता अछि।”
ललित भाय बजला-
“जहिना अधला काजक वा अधला विचारक प्रभाव हवा जकाँ आगू बढ़ैए तहिना नीकक सेहो अछि। तँए दोसर लग बजलासँ ओहूमे शक्ति अबैए। वएह शक्ति मनुक्खकेँ शक्तिवान बनबैए। जहिना वृन्दावनमे शक्ति-स्वरूपा राधाक सामूहिक शक्ति कृष्णकेँ शक्तिवान बनौने छेलैन, तहिना। जइसँ गोपीक झुण्डमे राधाक संग कृष्ण दिन-राति रास रचै छेला।”
ललित भाइक विचार सुनि मन मोमवत कहियौ आकि पानिसँ घुलल माटि जकाँ, दलदल भऽ गेल। बजलौं-
“आब अपना काजपर आउ भाय।”
काजक नाओं सुनिते बेटा दिस देखबैत ललित भाय बजला-
“देवकान्तकेँ तूँ चिन्है छहक की नइ?”
गामक एक्के टोलक दुनू गोरे जखन छी, तखन किए ने चिन्हतिऐन। मुदा दस बर्खसँ परदेश रहने देवकान्तक देहक सिख-लिखमे थोड़-थाड़ अन्तर आबिए गेल अछि। बजलौं-
“किए ने चिन्हबैन।”
ललित भाय बजला-
“दस बरख बम्बैक जीवन बितौला पछाइत देवकान्त जखन करोनाक दौड़मे पुलिसक हाथे खूब मारि खेलक आ नोटबन्दीक समयमे नोट हथियौलक, तखन गामक सुरता खिंचलकै। आब ई गामेमे रहत, तँए बासभूमिक विचार करए आएल छी।”
ललित भाइक विचार सुनि मन मोर जकाँ नाचि उठल। बजलौं-
“भाय साहैब, जेतए बसी सएह सुन्दर देशक सुन्दर बास भेल, आ जइ प्रतापे जीबी वएह प्रतिपालक राजा भेला। पहिने जखन साधन विहीन लोक छल तँ ऊँचगर जमीनकेँ बास बना बसै छला, मुदा आब तँ साधन सम्पन्न लोक भऽ गेला अछि, तैपर गाम-गाममे रोड-सड़क सेहो बनि गेल अछि, तँए गामक अधिकांश जमीन बासभूमिक भइये गेल अछि।”
ओना, देवकान्तक मन झुझुआएल मुदा ललित भाय बुझि गेला जे जे मनुक्ख अप्पन जीवन बनबैक शक्ति अपनामे रखने छैथ ओ अप्पन बासभूमि बनबैक शक्ति सेहो तँ रखनहि छैथ। ललित भाय बजला-
“भने कहलह मकशूदन, सस्त जमीनक मूल्य सेहो बढ़त आ मरल जमीनमे जान सेहो औत।”
शब्द संख्या : 2639, तिथि : 31 मार्च 2023