गंगा-ब्रह्मपुत्रक
मैदानी क्षेत्रमे प्रेमपुरो एकटा गाम अछि। ओना, गाम तँ गामे छी, आने गाम जकाँ अछि। माने ई जे जहिना आन गाम सभ अछि जे किछु गोरेले नीक अछि
तँ किछु गोरेले अधलो अछिए। देखते छी सोहनपुर गाममे एकटा जमीन्दार परिवार अछि जे सभ
दियाद तीन-महलासँ पँच-महला मकान तक बनौने छैथ, बाँकी जेते
गामक लोक छैथ तइमे बेसी ओहन छैथ जिनका इन्दिरो आवास बनबै-जोकर घराड़ी नइ छैन जइसँ
घरक कोन बात जे घराड़ियो नइ छैन आ किछु गोरे एहनो तँ छथिये जिनका अप्पन घराड़ियो
छैन आ चौघारा घरो छैन। तँए कहब जे सोहनेपुर जकाँ सभ गाम अछि सेहो बात नहियेँ अछि।
एहनो गाम अछिए जइमे त्रेता युगीन जनकपुर जकाँ, जैठाम डोमक घर
देख अयोध्याक बरियाती भ्रमित भऽ गेला जे हमरा सभक बरभूमि, माने
बरियाती रहैक बेवस्था केतए अछि। खाएर जे अछि ओ त्रेतायुगक भेल। अखन कलयुग छी,
मशीनक युग छी, आब लोक खरही-बत्तीक मड़बाक संग-संग
हवाइ जहाजक मड़बामे बिआह करै छैथ, तैठाम जँ अहाँ कहबै जे सात
बहिनक बीच एक बहिन कोसीक बाढ़ि सम्हारैक शक्ति नइ अछि तखन गाममे प्रगतिक (विकासक) खरही
केना गाड़ब।
प्रेमपुर
ओहन गाम अछि जइ गाममे पाँचे बर्खक अवस्थामे श्याम आ सुधीरकेँ गामक स्कूलमे दोस्ती
भेलैन। दोस्ती एतबे नइ भेलैन जे हम दुनू गोरे गौंआँ छी आ गामक स्कूलमे पढ़ैले
प्रवेश केलौं अछि। भेल ई जे आइसँ दुनू गोरे जीवनक एकटा पथ पकड़ैक खियालसँ आएल छी।
आइयेसँ ने अक्षरक बोध हएत,
माने ज्ञानक संग सम्बन्ध बनत जइसँ संकल्पक संगे नीक जीवन बनबैक व्रत
सेहो लेब।
जहिना
कोनो गाम-समाजक बीच अपन गाम-समाजक कल्याणक दिशामे समयानुकूल परिवेशक अनुकूल चलैक
व्रत लऽ चलए लगै छैथ जइसँ समाजक संग-संग अपनामे गति सेहो अबैए। जइसँ गतिशील होइत
बेकतीक संग समाजो गतिमान बनि प्रवाहित हुअ लगैए, जइमे व्यवधान भेबे
कएल अछि। तइमे दोख सभक अछि। ई कहबै जे लोहाक दोख अछि आ लोहारक दोख नइ अछि, सेहो बात नहियेँ अछि। आ जँ ई कहबै जे लोहारक दोख अछि लोहाक दोख नहि अछि, सेहो बात नहियेँ अछि, सेहो अछिए। अपन-अपन सीमामे
दुनूक दोख अछि। खाएर जे अछि, मुदा ईहो विसरब उचित नहियेँ
होएत जे त्रेता युगमे हनुमानजी लंकासँ आम अनने छला, आम नइ
अनने छला, आम खा कऽ आँठी फेकने छला, जे
कलकतिया आमक आँठी कलकत्तामे खसल, बम्बैक आँठी बम्बैमे आ मालदहक
मालदहमे। सभ अपन धरोहरक खोज करै छी, तँ ईहो खोज करए पड़त ने
हजारो बरख पूर्वसँ अबैत मालदह (सपेता) आम वा आने-आन फलक जे रूप-रंग-सुआद छल तइमे आ
अखन जे समाजक विकसित रूपक दृश्य अछि तइमे केते परिशोधन-परिवर्द्धन भेल अछि..?
आन गामक
अपेक्षा प्रेमपुरमे एकटा आरो गुण अछि। ओ अछि जे जेना आन-आन गाममे शासक सदृश किछु
जाति-विशेष अछि आ किछु जाति शासित जकाँ अछि, से प्रेमपुरमे नहि अछि।
ओना, आन गामक अपेक्षा प्रेमपुर गामक समाजक बनावटो किछु भिन्न
अछि। जेना आन गाममे एकाध[1]
जाति बहुसंख्य रूपमे अछि से प्रेमपुरमे नहि अछि। ने एकाध जातिक वर्चस्व अछि आ ने
एकाध जाति बहुसंख्य अछि आ ने अल्पसंख्य। दर्जनो एहेन जाति अछि जे सभ तरहेँ
ऊपरा-ऊपरी अछि, जइसँ कोनो खास जातिक दबदबा ओतेक नहि अछि जेते
आन गाम सभमे अछि।
गामक
स्कूलसँ लऽ कऽ कौलेज तक,
दुनू परिवारक बीच माने श्याम आ सुधीरक परिवारक बीच, ओ प्रगाढ़ता दोस्तीमे नहि आएल अछि जे पछाति आएल। अखन तक, माने विद्यार्थी जीवनक तक, दुनूक बीच एकाकी सम्बन्ध
बनल आबि रहल छल। माने ई जे जहिना श्यामक परिवारक तहिना सुधीरक परिवारमे, पारिवारिक ओहन सम्बन्ध नहि बनि सकल छल जेहेन दू परिवारक बीच घनिष्टतम
सम्बन्ध होइए। माने ई जे रीत-रिवाज, लेन-देनक सम्बन्ध बनला
पछाइत जेहेन होइए। अखन तक श्यामो आ सुधीरोक बीच देहा-देही सम्बन्ध मात्र बनल आबि
रहल छल।
पढ़ाइ
छोड़ला पछाइत दुनू परिवारक बीच सम्बन्धमे प्रगाढ़ता आएल। परिवारक पीढ़ियो बदलल।
माने जेनरेशन सेहो बदलल। अपना जीवितेमे जहिना श्यामक पिता मनमोहन तहिना सुधीरक
पिता हरिवंश,
दुनू गोरे अपन-अपन परिवारक भार बेटाकेँ सुमझा देलैन। भार एला पछाइत
श्याम आ सुधीर– दुनू गोरे अपन दोस्तीमे बढ़ोत्तरी केलक। बढ़ोत्तरी ई केलक जे अखन
तक, माने विद्यार्थी जीवन तक, दुनूक
बीच खेनाइ-पीनाइ पैंच-उधारक संग किताब-कॉपीक लेन-देन तक जे समटल छल, ओइमे एकाएक बढ़ोत्तरी भेल। जइसँ दुनू परिवारक बीच एहेन सम्बन्ध बनि गेल
जेहेन जीवन-मृत्युक सम्बन्ध बनने होइए।
एक
स्कूल-कौलेज आ एक शिक्षकक शिक्षा पेब दुनूक विचारक बीच सम्बन्धमे सेहो एकरूपता
छेलैहे। ताशक पत्ता जकाँ विचारमे फेंट-फाँट नइ भेने विचारो आ बेवहारोमे एकरूपता
छेलैहे जे समाजक सभ देखियो रहल छला आ मानितो तँ छेलाहे जे दुनू बेकतिये नहि,
परिवारोक सम्बन्ध एहेन अछिए जे अटूट-अकाट्य बनि गेल।
आने-आन
गाम जकाँ प्रेमपुरमे सेहो सत्ताक हिलकोर उठल। जइसँ अनेको तरहक नव-नव विचार सेहो
आएल आ पुरान विचार ध्वस्तो भेल। सामन्ती परिवेशक समाजमे अर्थक (धन-सम्पैत) जे
रूप-रेखाक चित्र देखै छी तइमे बदलाव आएल। पूँजीवादी बेवस्थामे अर्थक[2]
रूप बदलने समाजक रूप-रेखामे सेहो बदलाव अबिते अछि। जइसँ जीवन-शैलीमे सेहो बदलाव
अबिते अछि। जगरनाथपुरी,
जे समुद्रक कातमे स्थापित अछि। जैठाम पुरीक दर्शन केनिहार, माने जगरनाथ स्थानक कृष्ण-बलराम-सुभद्राक दर्शनार्थी, समुद्रक कातमे ढूसि असनान सेहो करिते छैथ। ढूसि असनानक माने भेल जे
समुद्री लहैरमे बैसल-बैसल केतौ-सँ-केतौ पानिक संग भँसि जाएब आ लहैर जखन शान्त भऽ
पाछू हटत तखन अपने-आपकेँ केतौ बालुपर बैसल देखब।
सत्ताक
हिलकोर उठने आने गाम जकाँ प्रेमपुरक समाज सेहो राँइ-बाँइ भऽ टुटि गेल। जैठाम
एक-दोसरमे मधुर सम्बन्ध छल तैठाम भोरसँ साँझ धरि गारि-गरौऐल, मारि-पीट हुअ लगल। अखन तक जे प्रेमपुर शान्त गाम छल से अशान्तिक रूप पकैड़
लेलक। जखने गारि-गरौऐल, मारि-पीट हएत तखने केश-फौदारी सेहो हएत।
केस-फौदारी हएत तखन एक-दोसरकेँ निच्चाँ देखेबोक खियालसँ आ निच्चाँ करबोक खियालसँ
समाजक लोक एक-दोसराक विरोधमे तैयार भइये जाइए। एहने परिवेश बनला पछाइत श्याम आ
सुधीरक बीचक सम्बन्ध सेहो राँइ-बाँइ भऽ टुटि गेल। जँ सोझे टुटल रहैत तखन किछु दोसरो
सम्बन्ध रहैत, मुदा से नहि, एक-दोसराक
बीच गारि-गरौऐल, मारि-पीट, केस-फौदारी
सेहो भऽ गेल।
दरबज्जापर
एकान्तमे बैसल श्याम एकाग्र भऽ अपन जीवनानुभव कऽ रहल अछि। तीनू तरहक, माने पूर्ववर्ती, समकालिन आ परवर्ती जीवनक समीक्षा
कऽ रहल अछि। जेठ मासक बाधक ‘लू’ जकाँ आँखिक
आगूमे जीवन चमकए लगलइ।
जीवनक
आधा भाग, माने जेना अपना ऐठाम अधिकांशक मनक धारणा एहेन बनले अछि जे साए बर्खक जीवन
होइए, बीत गेल। आधा शेष अछि, जइ दुनूक
बीच सीमापर आइ ठाढ़ छी। अपन सीमा मनमे अबिते श्याम चकोना भेल। चकोना होइते अपन बाल
मित्र सुधीरपर नजैर गेलइ। एकाएक हारल मन जकाँ श्यामक मन बीतल जीवनमे हेरा गेलइ।
मनमे मिसियो भरि ठेकान नइ रहलै जे जइ सुधीरक संग अखन तकक जीवनक सम्बन्धक सभ खेल
खेलैत आजुक सीमापर आबि गेलौं, ओइ जीवनक संग आ अबैबला जीवनक
संग महाभारतक लड़ाइ जकाँ दुनू जीवनक बीच दल-बलक संग युद्ध हएब अनिवार्य अछि,
माने एहेन परिवेश बनि गेल अछि, तँए एक नारद आकि
विदुरक कोन बात जे सइयो नारद आ विदुर एकतारा लऽ कऽ घुमैत रहता तैयो लड़ाइ हेबे
करत। धरतीक मांग छी, कियो रोकि नहि सकैए।
लड़ाइमे
प्रेवश करैसँ पहिने जहिना अर्जुनक मन थरथरा गेल छेलैन, तहिना श्यामक मन सेहो थरथरा गेलइ। थरथराइते पत्नीकेँ नाम लैत सोर पाड़ि बाजल-
“कने
जल्दी सोझ आउ।”
पतिक थरथराएल
स्वरलहर सुनि रीता कनी फरिक्केसँ बजली-
“की
कहै छी?”
जहिना
बाढ़िक पानिक लहैर वा हिलकोर असथिर पानिकेँ सेहो लहरा वा हिलकोरि दइए,
तहिना श्यामक मनमे अपने जीवनक दोसर लहैर आबि गेलैन। पत्नीकेँ लगमे अबिते बजला-
“एक
गिलास ठण्ढा पानि आ एक गिलास गरम चाह जल्दी पिआउ। मन उविया रहल अछि।”
पतिक
विचार सुनि रीता बजली तँ किछु नहि, सोझे चाह-पानि आनए अँगना
दिस बढ़ली, बीचमे अपने मन कहलकैन जे भरिसक सुधीर दोस मोन
पड़ल छैन, दोस्तसँ बनल दुश्मन लेल संगी ताकि रहल छैथ,
तँए मन अथीर बनि गेल छैन। हम तँ पत्नी भेलौं, हुनके
(पतिक) जीवन ने अपनो जीवन छी। जाबे छैथ, पतिक राजक राजी बनल
छी, परोछ भेने चूड़ी आ सिनुरक मान आने जकाँ ने अपनो मरि जाएत।
घाराक
प्रवाहित धार जकाँ श्यामक मनमे कौलेजमे पढ़ल भूगोलक पन्नामे पहुँच गेलइ। तैबीच
रीता पानिक गिलास आगूमे रखि चाह आनए पुन: आँगन दिस बढ़ली। पानि पीबिते श्यामक मनमे
भूगोलक पन्नाक ओ पोना अपने नाचि उठलैन। नाचि उठलैन ई जे दुनियाँक बीच विषुवत रेखा
अछि जे जीवने जकाँ बीचक सीमा छी। दुनियाँ जकाँ माने भेल जे जहिना सत्य-असत्य, नीक-अधला, उचित-अनुचित इत्यादि द्वन्द्वक बीच चलैए
तहिना ने प्रकृति सेहो चलैए। भलेँ एक दूरी माने दुनू द्वन्द्वक बीच, भेने एकरंगाहे उपजा-बाड़ी, फल-कुफल किए ने एक्केरंग
भऽ जाउ, मुदा मौसम तँ विपरीत भइये जाइए।
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