कान फुटल कप
माघ
मासक अन्तिम रबि। आइ सालक अन्तिम मक्कर सेहो छी। ओना पैछला साल जकाँ तँ नहि, मुदा तैयो
चारि बजे भोरेसँ महादेव बाबाक जलढरी शुरू भाइये गेल। तइसँ पहिने माने चारि बजेसँ
पहिने, पण्डा-पुजारी अपन-अपन मन्दिरकेँ धोइ-पोछि स्नान कऽ
पूजा-अर्चना कए लेलैन। पूजा-अर्चना केला पछाइत आमजन-ले महादेव मन्दिरक पट खुलले
छोड़ि देलखिन।
ओना, जेना पहिने
माने दस साल पूर्व विदेश्वर स्थान हौउ कि चण्डेश्वर स्थान आकि जागेश्वर स्थान, सभ स्थानमे मकरो आ शिवरातियोक जेहेन मेला होइ छल तेहेन तँ आब नहियेँ
होइए, मुदा नइ होइए सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। तीनू स्थान
पुरान अछिए। हालमे जे परसा स्थानक स्थापना भेल ओ तीनू मेलाकेँ प्रभावित केलक।
ओना तीनू स्थान महादेवक छी जखन कि परसा स्थान सूर्यक छी। परसामे सूर्यक मूर्ति
स्थापित अछि। मन्दिरक बगलमे जे पोखैर अछि, वएह खुनाइकाल
मूर्ति भेटल, जे स्थापित भेल आ पछाइत मन्दिरो बनल। नीक मन्दिर
अछिए।
दरबज्जापर
बैसल जीवन काका रस्ते-रस्ते परसा धामक यात्री सभकेँ गीत गबैत जाइत देखलैन। ओना
परसा स्थानमे सूर्यक मूर्ति स्थापित अछि मुदा यात्री सभ भोले बाबाक नचारी गबैत
जाइत। स्त्रीगणक हिसाबे पुरुख कम, मुदा सोल्हन्नी कम, सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। मोटा-मोटी दसअना-छअनाक अन्तर अछिए। दसअना स्त्रीगण
आ छहअना पुरुख। ओना माघक अन्तिम रबि छी, तीन दिन संक्रान्तिकेँ
बाँकी छै, चारिम दिनसँ फागुन चढ़ि जाएत। आधा फागुन–माने
अनहरिया अमावसियामे–शिवराति हएत। आन सालक माघसँ सेहो ऐ बेरक माघक रूप बदलल अछिए।
आन साल जेना शीतलहरी होइ छल आ गोटे साल बरखे भऽ जाइ छल से नहि। ने केतौ असमानमे
मेघे चिलियाइए आ ने शीते-पालाक जोर अछि। पनरह दिनसँ ठेहा रौद रहने माघ मासक
रूपे-रेखा बदलल अछि। किरिण फुटिते लोक देहसँ चद्देर उतारि अपन-अपन काज-उद्यममे लगि
जाइ छैथ।
चौकीपर
बैसल जीवन कक्काक मनमे उठलैन जे जखन जाड़ ओरानियेँपर अछि तखन किए ने अपनो दुआर-दरबज्जाकेँ
झाड़ि-बहारि चिक्कन-चुनमुन बना ली। कातिक माससँ घूर होइत आबि रहल अछि जइसँ छप्परोमे
आ देवालो सभमे झोल-झाल लटकल अछि। तेकरा सभकेँ झाड़ि-झूड़ि चिक्कन करबेक अछि। भने
आइ रबि दिन छीहे...।
ओना, रबि दिनकेँ
पलखैत नोकरिहारा सभकेँ होइ छैन मुदा से नहि, जीवन काका बदलैत
मौसमक खेती-पथारीसँ निचेन भऽ गेल छला। खास कऽ गरमा खेती-पथारीसँ निचेन भऽ गेल छला, माने गरमा खेती सभ लगा लेने छला आ जाड़क खेती सेहो अन्तिम अवस्थामे पहुँचिये
गेल छैन। समए पकड़ेने ऐगला-पैछला दुनू खेती सम्हरले छैन।
ओना
परिवारे छी, केते रंगक काज रहितो अछि आ केते नबो सिरासँ जनमबो करिते अछि, जेकरो सम्हारब रहिते अछि। मुदा सेहो हेबे करत। भेल तँ दू-तीन घन्टाक
काज झाड़-झूड़सँ लऽ कऽ बाहरब-सोहरब तक। तहूमे जखन परिवारमे रहि परिवारेक लेल
दिन-राति अपसियाँत रहै छी, तहीमे ने दुआरो-दरबज्जाक
झाड़-बहार चिक्कन-चुनमुन करब अछि।
जिनगीक
अन्तिम पड़ावमे जीवन काका आबिए गेल छैथ। अन्तिम पड़ावक माने भेल साठि बर्खक उम्र
टपि जाएब। ओना अपन जिनगीक चारिम दरबज्जा सेहो जीवन कक्काक छिऐन्हे। माने ई जे
शुरूमे माटिक भीतपर खढ़क छाड़ छेलैन जे 1971 इस्वीमे–जइ
बेर पाकिस्तानसँ बंगला देशक लड़ाइ भेल–सालो भरि बरखा-बुन्नी होइते रहल। सालो भरि
ई भेल जे चढ़िते फागुनसँ जे बरखा शुरू भेल ओ बरखा-मौसम टपा देलक। ओना सालक तीन ऋृतु
एकटा ऋृतु ‘बरखा’क अछि। जे अखाढ़सँ
शुरू होइए आ आसिन अन्त होइत-होइत हथिया नक्षत्रमे हाथ धोइत अन्त होइए। मुदा ओइबेर चढ़िते फागुनमे जे बरखा शुरू भेल ओ तेना
लधलक जे सालो भरि लधनहि रहि गेल। जीवन काका दरबज्जा छाड़ैले जे राड़ी-रटनी खढ़
रखने छला ओ जाकेमे सड़ि गेलैन। आठ कट्ठा खरहोरि जीवन काकाकेँ छेलैन, जइमे राड़ी-रटनी खढ़ होइ छेलैन। ओना पहिने डबहारी सेहो होइ छेलैन मुदा ओ
उपैट गेलैन आ राड़ी-रटनी हुअ लगलैन। हलाँकि राड़ियो-रटनीमे एकटा तेहेन आफद आबि
गेलैन जे नइ चाहितो जीवन काका ओकरो उपटाइये लेलैन। आफत ई जे शुरूमे तँ कम्मे-सम्म
लजैनी खरहोरिमे जनमलैन मुदा जेना-जेना समए बीतैत गेल तेना-तेना ओकर विरधी होइत गेल।
विरधीक कारण छल ओकर फूल-बीआ, जे साले-साल बढ़ए लगल। तैसंग लजैनीक
पुरना जड़ि सेहो जीवित रहने बरखा मौसम पाबि कच्चे-बच्चे पोनैग झमटगर गाछ भाइए गेल
छेलैन।
ओना, अपना जनैत
जीवन काका खढ़क जाककेँ बँचबैक नीक परियास केलैन, परियास ई जे
जखन बरखा बन्न रहै आ रौद उगै तखन खढ़क जाकक बोझ सभकेँ उनटा-उनटा पसारि दइ छेलखिन, मुदा सभदिना वा तेसरा दिनक बरखा भेने नइ सम्हरलैन। खढ़ सड़ि गेलैन, घरक चारपर नहि चढ़ि सकलैन। एक तँ बिनु छाड़ल घर माने नबका छाड़ नै पड़ल
छल, जइमे कौआ सभ आ हवो-बिहाड़ि तेना भूर-भार आ उजाड़ो-पुजार
कऽ देने छेलैन जइसँ बरखामे खूब चुआठ भऽ गेलैन। एक तँ सालो भरि बरखाक पानि घरमे
लगने, उपछा-उपछी केलो पछाइत घरक धरती थलियाएले रहलैन। चारक
ठाठक कोरो-बत्ती सेहो सड़िये गेलैन। आ तैपर खरहोरि सेहो लजैनियेँक भऽ गेल छेलैन।
अन्तमे खरहोरि उपटा कुम्हारसँ खपरा बनबा जीवन काका दरबज्जा छाड़लैन।
1987 ई.क बाढ़िमे जीवने कक्काक कोन बात जे गामक जेतेक भीतघर छल ओ खसि पड़ल। आब
तँ सहजे नव पीढ़ीक लेल भीतघर किताबक बात भाइये गेल अछि। ओना,
पहिने भीत घरक उपटान कोसी धारक इलाका आ कमला धारक इलाकामे भेल मुदा सत्तासीक बाढ़ि
उपराइरो इलाकाक भीतघरकेँ उपटौलक।
जहिना
ठेंस लगने बुधि बढ़ै छै तहिना जीवन काकाकेँ सेहो बढ़लैन। काँच माटिक दरबज्जाक भीत
पानि पीब माटिक ढिमका बनि गेलैन आ पेट गड़े खसने पाकल माटिक खपरा दोसर ढिमका सेहो
बनि गेलैन। खाएर जे भेलैन मुदा जखन मनुख छी, जीबए चाहै छी तखन घरक ओरियान करइ पड़त
किने। सएह जीवनो काकाकेँ भेलैन। कँचपक्कू पजेबाक देवाल आ सीमटीबला चदराक दरबज्जा
बनौलैन। एक तँ कँचपक्कू पजेबा तैपर माटिक गिलेबाक जोड़,
अठासीक भुमकमे तेते फाट-फुट भेलैन जे सदिकाल खसैक संभावना बनले रहलैन। राँइ-बाँइ
तँ देवाल नहि फटलैन मुदा देवालमे तीनटा ओहन फाट भऽ गेलैन जे कखनो हवा-बिहाड़िमे घर
खसि सकैत छल।
ओना
ओहनो स्थिति (फाटल-फाटल देवाल) मे दोसर दरबज्जा जीवन काका नइ बना सकला। तेकर
कारण छेलैन जे परिवारक आर्थिक स्थिति ओहन दबि गेल छेलैन जे घर सन जिनगीक मूलभूत
खगता रहितो पुरती नइ कऽ सकला। दस बर्खक पछाइत जखन स्थिति सुधरलैन तखन चारिम खेपक
दरबज्जा बनौलैन। बीतैत कातिक आ चढ़ैत अगहनसँ जे घरमे घूर–जाड़क दुआरे–करए लगला, ओहीमे जे
धूआँसँ झोल-झाल लगलैन ओकरे साफ करैक विचार जीवन काका केलैन।
घरक
हिसाबसँ वस्तुओ-जात भरले छैन। तहूमे सुतैक चौकी आ दुनू अलमारी तेना जगह छेक नेने
छैन जे कोण-काण छोड़ि केतौ खाली जगहे ने छैन। ओहीक एक कोणमे चाह बनबैक चुल्हियो आ
जारनो-काठी रखै छैथ, दोसर कोणमे जूता-चप्पल, तेसर कोणमे कपड़ा टँगैक अलगनी
आ चारिम कोणमे रद्दी-फद्दी कागजो आ आनो-आनो टुटल-फुटल वस्तु-जात रखै छैथ। ओना
रद्दी-फद्दी कागतक उपयोग चुल्हि पजारे काल सेहो करिते छैथ जइसँ कागत तँ कम्मो–सम्म
मुदा इंक सठल पेन, फुटल कप, ठुठियाएल
हँसुआ-खुरपी इत्यादि तँ रखिते छैथ।
चाह
पीब जीवन काका जखन दरबज्जाक भीतर हिया कऽ देखलैन तँ ऊपरेसँ माने घरक छतेसँ झाड़-झूड़
करब नीक बुझलैन। नारियलबला झाड़ू लऽ ऊपरसँ झाड़ब शुरू केलैन। कोणमे कानो फुटल आ
डण्टियो टुटल कप देखलैन तँ समोह लगि गेलैन। समोह लगिते जहिना मन कँपलैन तहिना हाथो
बगा गेलैन। कप दिस बढ़ैत हाथे अँटैक गेलैन। ने आगू बढ़ि कप पकैड़ सकला आ ने हाथ
पाछूए हटा सकला। मन पड़लैन पोता रोशन...।
रोशने
एक दिन भिनसरू पहरमे चाह लइले कप आँगन लऽ जाए लगल तँ केबाड़क चौकैठमे पएर ठेक
गेलइ। पौने दू बर्खक रोशनक हाथ-पएर असथिर नइ भेल छल, खसि पड़ल जइसँ कपक डण्टी टुटि
गेल। कपक डण्टी टुटल मुदा कप ओहिना रहि गेल जहिना पहिने छल। खसैत रोशनकेँ देखते
हाँइ-हाँइ कऽ जीवन काका दुनू हाथे उठबैत बजला-
“रोशन बौआकेँ की भेल?”
कानैक
झोंकमे तँ रोशन किछु ने बाजल मुदा जहिना थारी-लोटामे डोलैत पानि धीरे-धीरे असथिर
होइत तहिना रोशनक मन सेहो असथिर हुअ लगल। थरथराइत रोशन बाजल-
“गिर...।”
रोशनक
मुहमे ओते बोल कहाँ छै जे पतियानी लगा बाजत। ओ तँ पौने दुइए बर्खक अछि। तहूमे
बाल-बोध व्याकरणक बात की बुझत...। जेना दर्द भेलापर काँचो तेल आ पकलो तेलसँ दर्दक
हिसाबसँ मालिश कएल जाइत तहिना जीवन काका दुनू हाथसँ रोशनक हाथ-पएर ससारैत
झाड़ैत-पोछैत बजला-
“बौआक दुख मेटा गेल। कहाँ किछु भेल अछि।”
‘नइ किछु भेल’ सुनि रोशन मुँह बन्न करैत अपन काजकेँ
आगू बढ़बैत हाथक इशारासँ कप देखबैत बाजल-
“उ-उ..!”
कप
उठा हाथसँ पोछि रोशनक हाथमे पकड़बैत जीवन काका बजला-
“बौआ, चाह पीत।”
कप
नेने रोशन माए लग पहुँच, जेतए चारि-पाँचटा कप चाह-ले सजल छल, ओतइ अपनो कप
रखि आँगुरक इशारासँ देखबैत माएकेँ कहलक-
“उ-उ..!”
कोणमे
राखल डण्टी टुटल, कान फुटल कपकेँ हाथमे उठबैत जीवन काका निहारए लगला। मन पड़लैन- जएह डण्टी
तोड़लक सएह ने कानो फोड़लक। जहिया डण्टी टुटैकाल चौकैठ लग रोशन खसल रहए, ओकर पनरहे दिनक पछाइत दोहरा कऽ खसल जइसँ आधासँ ऊपर कपक कान फुटि गेल, जइसँ चाह पीबै-जोकर कप नइ रहल। भाय, कप छिऐ किने
ओकर कानो नमगर-चौड़गर होइते छइ। हाथमे कप पकड़ने जीवन काका स्मृतिक बोनमे बोनैया
जकाँ वौअए लगला...।
आइ
रोशनकेँ ऐ घरसँ बाहर भेला मास दिन भऽ गेल। आइ जँ चेतन-सियानक मृत्यु भेल रहैत तँ
पहिल छाया भऽ गेल रहितै, मुदा ओ तँ पौने दू बर्खक रोशन डेढ़ हाथ खड़ा बाल-बोध छल, ओकर केना छाया बनतै आकि छाँह बनि आरा केना लगतै। ओकरा तँ माटियो आ माटिक
जीवाणुओ दुनियासँ मेटा देने हेतइ। हमहूँ तँ मेटाइये देलिऐ..!
एकाएक
जीवन कक्काक मनमे व्याकुलता जगए लगलैन। मुदा आब उपाइये की अछि। एतबे ने अछि जे
अपन चाह खातिर कपक डण्टियो तोड़लक आ कान फोड़ि कपकेँ निकम्मो बनौलक..!
मुदा
लगले जीवन कक्काक मन आगू घुसैक गेलैन। आगू घुसैकते मन विधुएलैन। विधुआइते मुहसँ
निकललैन-
“दोख तँ केकरो-ने-केकरो लगबे करत। कियो अपना सिर दोख थोड़े लिअ चाहैए, लेबो उचित केना हएत?”
विधुआएल
मुहसँ जीवन कक्काक बोल तँ निकैल गेलैन मुदा विचरण करैत विचार उठलैन- जे जन्म लेलक
ओकर मृत्यु हेबे करत, मुदा बीचमे तँ ओकर जीबैक औरदा छइहे...।
मन
विहुस गेलैन। विहुसते विचारलैन- ऐ कपकेँ रोशनक स्मृति स्वरूप खोलियामे सजा कऽ
रखि लेब। पौने दू बर्खक रोशन जेते दुनियाँ देखलक ओते तँ ओकरो साझी भाइये गेल अछि
ने, ओ तँ परिवारेजन ने बुझता जे जाड़ फटैत जहिना वसन्तक संग सूर्यक रोशनीमे
सेहो प्रखरता अबै छै तहिना बरखाक आगमसँ रौद खसए लगैत अछि आ तहिना ने जाड़क आगमनसँ
बर्खो विलीन हुअ लगैत अछि। यएह ने भेल दुनियाँक मौसम, जइमे
मासूम रोशनो तँ अछिए किने।
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शब्द संख्या : 1595, तिथि : 09 फरवरी 2017
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