Sunday, October 31, 2021

#कुण्ठा #उपन्यास #जगदीशप्रसादमण्डल


 

सातम पड़ाव

देवकान्त बाबू असगरे दरबज्जापर बैसल अपन जिनगी निहारि रहल छला। निहारि रहल छला जे आइ पाँच दिनसँ कोरोनाक प्रभावमे विद्यालय बन्न अछि। शुरूमे तँ तीनियेँ दिनक चर्च भेल छल जे विद्यालय तीन दिन बन्न रहत मुदा चारिम दिन अनिसचित काल धरि बन्न रहैक सूचना भेटल। तहीकाल पत्नी दमयन्ती चाह नेने पहुँचलैन।

कुरसीपर बैसल पतिक चिन्त्य रूप देख दमयन्तीक मनमे किछु शंका जगलैन। शंका जगैक कारण भेलैन जे आन दिन जे कुरसीपर बैस चिन्तन-मनन करै छला ओहन रूप आइ नहि छैन। चिन्तनोक दू रूप अछि, पहिल अछि अपन भार मुक्त, भय मुक्त भऽ कोनो समस्याक विषयमे चिन्तन करब आ दोसर अछि भय ग्रस्त, भार ग्रस्त भऽ चिन्तन करब। दमयनतीकेँ दोसर कोटिक बुझि पड़लैन तँए मनमे शंका जगलैन। मुदा किछु बाजि नहि रहल छेली। हाव-भावसँ परखैक परियास कऽ रहल छेली। मुदा अपने मन दयन्तीकेँ कहलकैन जे अखन अपन जे काज अछि तेकरा ओहिना निपटाबी जहिना सभ दिन निपटाबै छेलौं। पतिक आँखिक पल खसल देख दमयन्ती बजली-

चाह पीबू।

चाह पीबूसुनि देवकान्त बाबू आँखिक पल उठा पत्नीक चेहरापर देलैन। बदलल-बदलल रूप पत्नीक बुझि पड़लैन। कहलो गेल अछि जे जेहेन आँखि तेहेन दुनियाँ। ओना, दयन्तीक रूपमे कोनो बदलाव नहि रहैन मुदा कटल डारि वा कोनो लत्ती, तत्काल जहिना रहैए तहिना छेली। बदलाव नइ होइक कारण छेलैन जे बुझल छेलैन्हे जे विद्यालयमे (हाइ स्कूलमे) सालमे केतेको छुट्टी होइते अछि माने विद्यालय बन्न होइते अछि। ओना, छुट्टीयो मे छुट्टी होइए। जेना सालमे बावन-तीरपन टा रबि भेने वा दुर्गापूजा-गरमीक नमहर छुट्टी भेने केतेको रबिक छुट्टी ओहीमे फेंटा जाइए। तँए दमयन्तीक मनमे घर आ परिवारक कोनो रूप अपन चिन्त्य-रेख मनमे नहि अंकुरल छेलैन।

हाथ बढ़ा चाहक कप लैत देवकान्त बाबूक मनमे जगलैन जे जखन अनिसचित समय ले विद्यालय बन्न भेल तखन वेतनक अनिसचितता सेहो आबिये गेल। जाधैर परिवारमे खर्चक पूर्तिक हेतु आमदनी नहि औत ताधैर परिवारक कोनो-ने-कोनो काज मारले जाएत। जखने परिवारक काज मरत तखने परिवारक आमदनीक स्रोतो आ जीवनो टुटबे करत। जखने जीवन टुटत तखने रंग-बिरंगक समस्या पारिवारिक जीवनमे उठबे करत। मुदा अपन मनक विचारक वेगकेँ देवकान्त बाबू ई सोचि रोकलैन जे विद्यालयमे काज करब तखन ने दरमाहाक आशा करै छी जे महीना पुरलापर दरमाहा उठा, पत्नीक हाथमे दैत मास दिनक आश्रमक भार सुमझा दइ छिऐन। जेकरा ओ अपना ढंगे पार लगबैत अपन काज-भारसँ मुक्त होइ छैथ, तैठाम तँ स्पष्ट अछिए जे विद्यालय बन्न हेबाक जे परिस्थिति उठि ठाढ़ भेल अछि ओ सोल्होअना अपन भेल, तइले पत्नीकेँ किए कहि शोकाकुल करयैन? मुदा अपने मन आगू बढ़ि कहलकैन जे जखन पत्नीक हाथमे मास दिनक खर्च नहि देबैन तखन ओ केतए-सँ आनि आश्रम चलौती? मुँह दाबि देवकान्त बाबू बजला- विद्यालय, अनिसचित समय ले बन्न भऽ गेल।

अनिसचित समयक चर्च जइ ढंगे देवकान्त बाबू बजला तइसँ भिन्न ढंग पकैड़ दमयन्ती बजली-

विद्यालय बन्न भऽ गेल तँ कि हेतइ। बुझले बात तँ अछिए जे बैसारीक सबटा दरमाहा विद्यालय देबे करत। तइले..?”

पत्नीक विचार सुनि देवकान्त बाबू तत्खनात चुपे रहला, किए तँ अपने मन कहि रहल छेलैन जे अनेरे जे बकतूत करब तइसँ नीक ने जे जनिहेँ मियाँ धुनै बेरिया। जखन खाली मुट्ठी भार पड़तैन तखन बुझती। अनेरे ने गाबए लगती, गीता सवेद सभी विसरी जब हाथ पड़े हाथ लगना।

मुँह बन्न होइते देवकान्त बाबूकेँ मनक विचार ठेलैत कहलकैन, जे चूक भऽ रहल अछि.! एक दिस अनिसचित काल ले विद्यालय बन्न भेल अछि आ अपने परिवारक रोचे मुँह चोरा कऽ राखि जाबत बरतन ताबत बरतनक मंत्र जपैत रहि जाइ, तखन पत्नी खाली हाथ परिवारक गाड़ी केना खींच पौती.? जखन कि अपने खेबा काल पीढ़ी आ चाह पीबै काल कुरसी लगा बैसबे करब। छुच्छे हाथे, माने खाली, तँ यएह ने करती जे चुल्हिमे आँच घुसकबैबला खोंरनी मुँहपर तेना बैसौती जे कोयला छाप पड़त..! एकाएक देवकान्त बाबूक मन डोलि गेलैन जे जखन सभ मिलि परिवार बनल अछि तखन सभ मिलि चलेबो करब किने। नीक-बेजाए समय जीवनमे अबिते अछि। तँए किए ने नीक जीवनक झाँकियो आ अधला जीवनक जरोखो परिवाकर सोझमे राखि दी। संक्रमित मने पत्नीकेँ पुछैत देवकान्त बाबू बजला-

एकटा विचार पुछी?”

बालो-बोधकेँ जखन कहबै जे बौआ एकटा बात पुछै छिअ। कहह ते आइ तूँ की सभ खेलह? तँ ओ लगले कहत फल्लाँ चीज। तहिना दमयन्ती सेहो पुछैक विचार सुनि भाव-विह्वल भऽ गेली। जहिना भाव भूमिक भक्त अभक्त नहि होइ छैथ तहिना दमयन्ती महाभारतक नलक संगी जकाँ जीवनक संगी बनि चलैक उत्कट इच्छा व्यक्त करैत बजली-

अखन धरि हम ई नहि बुझै छेलौं जे अहाँ चोरो छी।

पत्नीक मुहसँ चोर सुनि देवकान्त बाबूक मन परसाएल गौरिया केरा जकाँ पलैड़ गेलैन। बजला-

चोर कि कोनो हमहींटा छी आकि अहूँ छी। जहिना अहाँ चोरा कऽ रखैबला चोर छी तहिना ने हमहूँ भेलौं। चलू अधा-अधीपर समझौता भऽ गेल। जे पुछए चाहलौं से कहै छी।

प्रेमारत्त प्रेमी जहिना प्रेममे रत्त भऽ जाइ छैथ तहिना दमयन्ती रत्त भऽ गेल छेली जइसँ मन बेकाबू भऽ गेलैन। बजली-

परिवार छी, ठट्ठा नहि, तँए कोनो विचार मने-मन रखि अपने ओझरा जाइ से नीक नहि।

पत्नीक सहीटगर विचार पेब विचार लग सटित पहुँच देवकान्त बाबू बजला-

राजदेवक माए, अखन तक विचारकेँ अहाँसँ चोरा कऽ रखने छेलौं। मुदा परिवेश एहेन बनि गेल अछि जे सुख-दुखक संगी बनि जँ नहि चलब तँ जीब कठिन अछि।

ओना, देवकान्त बाबू खोलि कऽ किछु नहि बजलैथ मुदा भावभूमि एहेन दमयन्तीक बनियेँ गेल छेलैन जे भवुका कऽ बजली-

यएह जीवन ने सृष्टिक रचना करत। मुँह दाबि किए रखने छी, मुँह खोलि बाजू। जहाँ धरि संग मिलि चलैमे सकब, तहाँ धरि तँ चलबे करब।

पत्नीक समर्पित स्वरूप देख देवकान्त बाबू बजला-

विद्यालय बन्न भेल, एकर माने एतबे नहि जे फेर खुजत। एकर माने ईहो भेल जे जहिना अनिसचित काल ले बन्न भेल तहिना कहीं बन्ने ने भऽ जाए। तखन की करब?”

अखन तक दमयन्ती जीवनक चक्रपर धियान नहि देने छेली। ओना, देवो केना करितैथ, पति ने बी.ए. पास कए हाइ स्कूलमे शिक्षक छथिन मुदा दमयन्ती तँ लिखै-पढ़ैक नामपर एकलव्य जकाँ औंठा छाप छैथ। तँए मैथिलानी नहि छैथ से बात नहि मानल जा सकैए। किसानी जीवनक पूर्ण महिलाक बोध छैन्हे। की अखनो मैथिलानी महाभारत नलक संगिनी दमयन्ती नहि छैथ? छैथ, महाभारतक दमयन्तीसँ बहुत बेसी छैथ। महाभारतक दमयन्ती हजारो बर्ख पूर्वक छैथ, जइ समय मनुक्खक जीवन जंगली रूपमे छल, मुदा आजुक मैथिलानी पुरुषोसँ आगू बढ़ि हवाइ जहाजक पाइलट, महा वैज्ञानिक नहि बनि रहली अछि, सेहो बात नहियेँ अछि। तँए ओहन-ओहन शक्तिशालिनी देवीकेँ खढ़-पतारक घूरक धुआँसँ झाँपब ओ केते काल झँपाएल रहत।

अदौसँ मैथिलानी पृथ्वीपुत्रक संग पृथ्वीपुत्री बनि बैशाख-जेठक रौद, सौन-भादवक झाँट-पानि आ पूस-माघक शीताएल-पलाएल राति, सौनक धनरोपनी, भादवक बरखा आ जाड़क धनउसनियासँ फटकनिया करैत दिनमे बारहमासा आ बारह बजे रातिमे अपन अस्त्र-शस्त्रक संग आमक ओगरवाही नहि करैत आबि रहली अछि, सेहो बात नहियेँ अछि। सेहो अछिए। अपन देह-देहीक शक्तिक वस्तु-स्थिति देखबैत दमयन्ती बजली-

नीक जकाँ नहि बुझि पेलौं, तँए कनी फरिछा कऽ बुझा दिअ।

सभ दिनसँ एहेन होइते आबि रहल अछि आ अखनो होइए जे कोनो बच्चा काजक लहलही देख ओइ दिस दौड़ काजकेँ खेलौना बुझि खेलैत आबि रहल अछि, तँ कोनो बच्चा जीवनकेँ खेलौना बना सेहो खेलाइते अछि। खाएर जे अछि, जेतए अछि तेतए रहह तइसँ देवकान्त बाबू आ दमयन्तीकेँ कोन मतलब छैन। मतलब छैन अपन परिवारक जीवनसँ। अपन बात फरिछाबैत देवकान्त बाबू बजला-

विद्यालय खुजल रहत आकि बन्न रहत से निसचित नहि कहि सकै छी, मुदा अपन जिनगी अनिसचित जकाँ नहि भेल जा रहल अछि तइमे मिसियो भरि शंका नहि अछि।

ओना दमयन्ती पतिक विचार सुनैत-सुनैत विचारमग्न होइत भाव-धारामे भँसियाइत देख अपन मनकेँ काबू केलैन। काबू होइते मन विचार देलकैन जे किए ने पतियेसँ पुछयैन जे अखन तकक कि स्थिति अछि आ आगूक कि सम्भावना अछि। दमयन्ती बजली-

जाधैर मनुक्ख अपने-आपकेँ परेख धरतीपर पैर नहि रोपत ताधैर पएर तरक धरती डगमगाइते रहत। तँए पहिने अपन जे जीवनानुभव अछि से पहिने कहियौ, पछाइत हम अपन कहब आ बच्चा सभ तँ सहजे अखन बाल-बोध अछि तँए ओकर मुँहक चहरा तँ बापे-माए ने पुरौत।

अपन हरैत (हारैत नहि, ओ दोसर शब्द छी) जीवन देख दे देवकान्त बाबू बजला-

अखन तक असीम शान्त छल जे चैनसँ जीवन बीति जाएत। परिवारक चक्रक हिसाबसँ बच्चा सभ सियान भऽ परिवारक गाड़ी खिंच लेत। मुदा बिच्चेमे एहेन विषय विस्फोटक परिस्थिति बनि गेल अछि जे विगत बीस बर्खसँ विद्यालय-महाविद्यालय शिक्षक विहीन भऽ गेल अछि, बच्चा रोडपर चक्कर काटि रहल अछि आ दोसर दिस ढोलक आवाज अबैए जे पढ़ाइ-लिखाइक दौड़मे छात्रक रिजल्ट नीक भऽ रहल अछि।

बजैक क्रममे देवकान्त बाबू बाजि गेला मुदा अपने मन महसूस केलकैन जे अनेरे केतौ किछु बाजि गेलौं.! अपने आकि पत्नीएकेँ कोन जरूरत अछि जे उड़ल कौआक पाछू दौगब जे हमर कान चोरा कऽ भागल जाइए। अपन कान किए ने देखब जे अपना अछि कि नहि। तैबीच दमयन्ती सेहो व्यंग्य करैत कहि देलकैन-

जहिना टेटराहा मुनसा अनके टेटर देखैए आ अपन टेटर देखते ने अछि तहिना..?”

अपना जनैत दमयन्ती इशारामे पतियेकेँ कहै छेली मुदा झोझा-सोझी कहैमे अपन सीमा भग्न होइत देख लाज भेलैन। अपन सीमा की छैन से तँ दमयन्तीए जनती, आन किए बुझि पौत। खग जानए खगक भाषा, देवकान्त बाबू बुझि गेला। मुदा पोखैर वा धारक पानिक डुमा-डुमी खेलमे जहिना हरदा बजौल जाइए तहिना बुझि देवकान्त बाबू अपन हीय खोलि बजला-

जीवनक धाराक बहुत बात बुझितो ने छी आ जेहो बुझै छी तइसँ विपरीत जीवन धार बहि रहल अछि, एहना स्थितिमे कोनो असथिर दिशा नहि देख रहल छी जे की करब?”

ओना, चिड़ैक गेल्ह जकाँ दमयन्ती आँखि-कान ठाढ़ केने मुँह बाबि सुनि रहल छेली, मुदा आँखियेमे कि कानेमे आकि मुहेँमे विचार सन्हिआइते ने छेलैन जे मुसरीक नाँगैर पकैड़ आगू दौड़ैबतैथ। मुदा लगले हदरा बाजब तहूँमे अपन पुरुख लग, तखन पटका-पटकी कोन जीवनमे खेलाएब.! अलंकारिक भाषामे दमयन्ती बजली-

एतबो ने बुझै छिऐ जे जे विधाता मनुक्ख गढ़लैन वएह ने पुरुष-नारीकेँ उन्टा-पुन्टा बना दुनूकेँ एकठाम साटि अपन सृजन शक्ति (निर्माणक) सेहो साटि देलखिन।

ओना, पत्नीक विचारकेँ देवकान्त बाबू सोल्होअना बुझि गेला मुदा मनमे शंका उठलैन जे एते जँ बुझै-करैक अवगैत बजनिहारिकेँ रहितैन तँ हमरे भरोसे ठाढ़ रहितैथ आकि बिहाड़ि भेल बताह रहितैथ.? एहनो तँ सम्भव भइये सकैए जे केकरो मुँहक सुनल बात बाजि हमरा ऊपर भारपन देखा रहल होइथ। एकाएक देवकान्त बाबूक मनमे मोड़ एलैन। मोड़ अबिते मन कहलकैन जे किए ने जीवनकेँ आगूमे राखि आगू बढ़ैक बाट पुछयैन। भगलाह जकाँ भग्गल लाधि अपन भग्गलपन देखबैत देवकान्त बाबू बजला-

अखन तक अपने यएह बुझै छेलौं जे अखन नोकरी करै छी, दरमाहा भेटैए तइसँ परिवार चला लेब, पछाइत जखन सेवा-निवृत्त हएब तखन पेंशनो भेटत आ बेटो सभ कमाए-खटाए लगत, तइसँ परिवार नीक जकाँ ससैर अपन सीमापर पहुँच जाएत। मुदा..!”

पतिक बात सुनि दमयन्ती अकचका लगली। अकचकाइक कारण भेलैन जे पतिक सभ बात तँ नहि बुझि सकली, मुदा एते तँ बुझबे केली जे नोकरी डमाडोलमे पहुँच गेल छैन। जखन नोकरी डमाडोलमे पड़ि जेतैन तखन तँ जीवने डोलि जेतैन। पछाइत अपना बुते सम्हारल हएत। आइ जँ अल्लापुरक रहितौं तँ खेती-पथारीसँ लऽ कऽ मालो-जाल पोसि परिवार चला लइतौं। मुदा से तँ छी नहि, छी तँ पचही परगनाक। जैठाम भूमि-छेदनकेँ पाप मानल जाइए आ पशुपालनकेँ गमारक वृत्त। तहूमे नारीक लेल तँ आरो महापाप, घरक माने-सम्मान चौपट्ट भऽ जाएत।

जहिना पत्नीपर ओङैठ देवकान्त बाबू बाजल छला तहिना पतिपर ओङठैत दमयन्ती बजली-

जहिना बापक घरसँ अहाँ हमर हाथ पकैड़ जीवनक रणभूमि ले अनलौं तहिना ने हम अखनो ढेका पकड़ने चलि रहल छी, मुदा अहाँ तँ पति छी। तँए अहाँक बिनु आदेशे किछु करब उचित हएत।

पत्नीक विचार सुनि देवकान्त बाबूक अपनो मन ऐ दुआरे मानि गेलैन जे आँखिक आगूमे एहने वृत्ताकार परिवार समाजमे देख रहल छैथ। बजला-

अखन विद्यालय बन्दीक पाँचे दिन बीतल अछि तँए अखन हँ-निहँस किछु नहि कहल जा सकैए। मुदा नजैरमे दुनू पक्ष तँ राखए पड़त। आगू कि हएत से तँ अखन आगू बाँचल अछि।

विचारसँ देवकान्त बाबूकेँ चिन्तित देख दमयन्ती बजली-

अनेरे ने चिन्ताक सोगसँ देहक शक्ति घटौने जाइ छी। कहुना छी तँ पुरुख छी किने। अपन पुरुखपन जगाउ। एकटा कोरोनाकेँ के कहए जे सइयो टा कोरोना किछु ने बिगाड़ि सकत।

पत्नीक पतनीत्व देख देवकान्त बाबू बजला-

असगर तँ लोक दुनियाँकेँ ऐ भागसँ ओइ भाग घुमि अबै छैथ। अपना सब तँ दू गोरे छी।

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शब्द संख्या : 1904, तिथि : 18 अक्टूबर 2021


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